अरिकोँ छक स्वाद
बरखी छलनि ओहि दिन हमरा बाबीकेर
ककरा नोँत दिऔ
ताही लय उठलै बहुतो काल घोँघाउजि
होइत घमर्थनि
ऊठि गेलैक पहर भरि बेर
बरखी छलनि ओहि दिन हमरा बाबीकेर।
***
बाबा, गामक सबसँ बूढ़
बूढ़ेटा नहि छथि प्रतिष्ठितो
बाजथि गप्प गूढ़सँ गूढ़,
एकरा घरमे, ओकरा घरमे
लगबऽ, बझबऽ, लय
नमराबथि रहि-रहि सूँढ़
नीक लगै छनि बैसल-बैसल
रहओ लड़ैत गामकेर लोक,
जँ क्यौ दै छनि हुनका टोक
तँ चुट्टा लगबै छथि, बाबू!
चूसि लैत छथि सबटा सोनित
जहिना धनहा पोखरिक जोँक।
बिनु बाबाकेँ नोतने,
अनका नोँति सकै छथि के बुड़िलेल!
तनिका सङ लगाय झमेल
भुस्सा थड़ि बैसयबामे ओ
राखथि अप्पन पहिल हाथ
जे नोतथि पहिने बाबाकेँ
तनिका बाबा करथि सनाथ।
***
पड़ल नोँत बाबाक
बाबा लेलनि फराठी दहिना हाथेँ
टपला पाँतर टेकिते-टेकिते।
हिँसखे छनि सब दिनसँ हिनका
नोँतक दिनमे दैत छथिन ओ
नमहर बेस लड़ुब्बा ठोप ठढ़का परसँ,
तखन वैदनाथी पासाकेर
उज्जर दप्-दप् बेस त्रिपुण्ड
नोँत खाय, भऽ जाथि भुसुण्ड!
एतबा धरि छनि खयनिहारो छथि
आयल वस्तु पातपर तकरा
बाबा कहिओ कयल न व्यर्थ
भोज-भातमे बहुतो ठाँ तँ
सहजहिँ बाबा करथि अनर्थ,
भरल जुआनीमे सठबैत छलाह
पसेरी भरि धरि गूड़
पन्द्रह सोड़ह रोहुक मूड़ा
छागर सौँसे पनपिआइमे
दही विलच्छन बस, दू छाँछ
सात सेर धरि तरले माँछ।
***
छलनि गम्हरिआ पीढ़ी राखल
माँजि-मूँजि लोटा भरि पानि
धो कऽ पैर बैसि पीढ़ीपर
बाबा एकदम देलथिन तानि
छत्तिसटा तिलकोड़ा खयलनि
कुड़-कुड़ बऽड़ एगारह गोट
पड़ल पातपर भात सठा कऽ
देलथिन पानि तखन दू घोँट
बड़ी सात डब्बुकटा खयलनि
छलै अधिक मेरिचाइक योग
माँझ पेट भरिअलनि तावत
बाँकी केवल रहलनि दोग
कड़ू छलइ तेँ—
दूनू पूड़ा भरि-भरि अयलनि पानि
जावत बाबा नाक झाड़लनि
बामा हाथेँ पोछलनि मोँछ
ताबत आबि गेलनि अरिकोँछ
नोर आँखिमे भरि-भरि अयलनि
कहऽ लगलथिन बात सम्हारि—
'आइ फेर ओ मोन पड़ल अछि
कते दिनुक बिसरलहा बात,
बाबी तोहर जीविते छलथुन
काजक रहय बतीसो दाँत,
हुनका हाथक रान्हल-बाटल
सन भेटल नहि तकरा बाद
मुइलथुन जहिये तोहर बाबी
ऊठि गेल हमरा लेखेँ
अरिकोँछक स्वाद।'
- पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 377)
- संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
- रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 2025
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