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चम्पा की विजय

champa ki vijay

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

चम्पा की विजय

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    भौंर। तुम ध्यानु हमारौ देउ।

    नेहु लगायौ ऐसे ते जो

    बन्द जेलि मा कीन्हिसि,

    कसिकै प्रेम-डोरि मा बाँधिसि

    छिनौ निकरैं दीन्हिसि

    परे राति भरि रहयौ कैदि मा

    रसु लै लै बतुवायउ

    बंद रह्यौ रस के म्यटुका मा

    छुट्टी तनिक पायउ।

    राति होति खन बंद होउ नित

    भला कैसि यह टेंउ।

    भौंर! तुम ध्यानु हमारौ देउ।

    स्वाचौ, जगु यहु छिनभंगुर हैं

    माया परदा डारे,

    स्वारथ लागि सबै अरुझे हैं

    नात अनेक बिचारे;

    वैसे ना कोई कोई का

    सिगरे दुख-सुख झूठे

    फिरि काहे तुइ फँसे जेलि मा

    फिरु आजाद अनूठे।

    प्रेम-बाँसु लै जगत नदी ते

    जीवन-नौका खेउ।

    भौंर! तुम ध्यानु हमारौ देउ।

    साँवरि-सुन्दरि तुमरी देहीं

    हमका बहुत रिझावइ,

    चीकन चाकन चमड़ा मो मनु

    पैकरियन रपटावइ

    'मन्न मन्न' का राग अलापौ

    जौनु हिये का भावइ

    तुम हौ प्रेमी रसिक बड़े से

    जगतु बड़ाई गावइ।

    अरे जाति हौ तुम औरन ढिंग

    सेवा हमरिउ लेउ।

    भौंर! तनि ध्यानु हमारौ देउ।

    14 जनवरी 1952 ई.

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 47)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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