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चलता-फिरता इतिहास हैं—

chalta phirta itihas hain—

कृष्ण चंद्र मिश्रा

कृष्ण चंद्र मिश्रा

चलता-फिरता इतिहास हैं—

कृष्ण चंद्र मिश्रा

और अधिककृष्ण चंद्र मिश्रा

    पुश्त-पुश्तानों का।

    कूटे हुए धान की ख़ुशबू से लेकर

    सड़ते हुए गोबर की महक तक

    महसूस की है मैंने

    मैंने ख़ुशी के आँसू भी देखे

    ख़ून के आँसू भी

    आज भी पहाड़ का वसंत मेरे प्राणों में समाया है।

    समाई है मेरे मन में शीत की पीड़ा

    जेठ की गर्मी से झुलसा हूँ मैं भी

    कभी मेरी मुड़ेर पर भी चाँदनी आई है

    मैंने मकानों की नींव खोदने से लेकर

    छत छाने तक उन्हें बनते

    बनने की बाद उजड़ते हुए देखा

    बहुत कुछ देखा। दाज्यू!

    बहुत कुछ देखा।

    ये हमारी बाखली चार से बारह मौऊँ की हो गई

    मैंने परिवार को बढ़ते

    पुरणियों को सड़ते

    अपनों को पहाड़ से जाते

    परदेसियों को आते हुए देखा

    गाँवों को उजड़ते

    शहरों को बनते-बिगड़ते हुए देखा

    बहुत कुछ देखा

    दाज्यू! बहुत कुछ देखा।

    जिस गाँव में आज तक किसी ने चींटी भी नहीं मारी

    उन गाँव वालों को मैंने

    पुलिस पटवारी को पकड़ते हुए देखा।

    पेड़ों को जड़ों से ज़मीन पकड़ते

    पीढ़ियों को जड़ों से उखड़ते

    बहुत कुछ बनते बिगड़ते हुए देखा।

    खेतों को बँटते

    आँगन में दीवारों को उठते

    रीति-रिवाजों को टूटते

    आफरों को बुझते

    मंदिरों को लुटते

    नदियों को सूखते पहाड़ों को टूटते

    अपनों को रूठते भाग को फूटते

    रोटी-नगाड़े, रणसिंग, बीनबाज को लुटते हुए देखा।

    अनपढ़ों को लिखते

    पानी को बिकते

    मैंने शराब बेचकर लोगों को घर भरते

    शराब पीकर लोगों को मरते

    भांग पीकर लोगों को डरते

    नशे के क़ारोबारियों को सड़ते-गलते हुए देखा।

    बच्चों को पर्वत ऊपर चढ़ते

    उनको चोटियों की तरफ़ बढ़ते

    ठँड से हथेलियाँ रगड़ते

    अपने को अपनों से लड़ते

    बाप के हाथों में बेटे को संवरते

    बेटे को बाप पर बिगड़ते

    बचपन में अँगुली पकड़ते

    जवानी में गला जकड़ते हुए देखा।

    भूखी उदास आँखों को टेरते

    कोल्हू से तेल निकलते

    प्रवासियों को बनते

    पहाड़ों को बिखरते हुए देखा।

    बहुत कुछ देखा दाज्यू

    बहुत कुछ देखा।

    हथियार तलवार

    ना ही कोई आयुद्ध

    हल हथौड़ा हाथ लिए

    हिला गए

    ब्रिटिश शासन की नींव—

    'मेरे सल्ट के शहीद'।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कृष्ण चंद्र मिश्रा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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