चालनि दुसलनि सूपकेँ
chalani dusalani supken
जनिका अपना गत्र-गत्रमे, भूर हजार देखार छनि,
पानि राति-दिन छथि भरैत, आ बाटे सबटा पार छनि।
मढ़य दोष आनेपर सब क्यो, अपने दूधक धोल अछि,
भारतवर्ष बढ़ल द्रुतगतिसँ, दुनियाँ भरिमे घोल अछि।
मुदा पड़ल छी हम दिग्भ्रममे, के सोझराबय बाट ई?
आइ अमीर-गरीबक बीचक, बढ़ले जाइछ पाट ई।
छी सब परम स्वतन्त्र, तखन पुनि नैतिकताकेर काज की,
अनुशासन अंकुश जँ रहले, तँ पुनि भेल स्वराज की?
सब कहैत छी बिनु उत्पादन, बढ़ने अछि कल्याण ने,
किन्तु करत जे उत्पादन, अछि तकरे थान-बथान ने।
ठाढ़ भेल अछि कल-करखाना, बनत विविध सामान सब,
करत उचित वितरण से सहसह, करइत अछि बैमान सब।
आइ ठाढ़ भऽ अयना लग हम, मुखड़ा अपन निहारि ली,
मारी अनका छिटकी, पहिने अपनो डेग सम्हारि ली।
हमरो अनके टेटर सूझय, अपन न कुब्बड़ मोन अछि,
फटकै छी उपदेश तकै छी, हम्मर कुरिया कोन अछि।
अँतरी साफ रहय आ लोकक संग शुद्ध व्यवहार हो,
तखने सम्भव अछि जे अपना, देशक पुनि उद्धार हो।
किन्तु पड़ल अछि पैर समाजक, भ्रष्टाचारक पाँकमे,
गन्ध लगै अछि अनकर, गन्हकी पैसल अपने नाकमे।
आजुक सकल समाज-व्यवस्था, चालनि केर प्रतीक थिक,
महगी बोकराबय शोणित, हम बूझी पानक पीक थिक।
बुझना जाइछ बिसरि गेल अछि, भारत अपन स्वरूपकेँ,
कहबी अछि चरितार्थ आइ जे, चालनि दुसलनि सूपकेँ।
- पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 389)
- संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
- रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 2025
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