चाय पर शत्रु-सैनिक

विहाग वैभव

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    रोचक तथ्य

    इस कविता के लिए कवि को भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

    उस शाम हमारे बीच किसी युद्ध का रिश्ता नहीं था

    मैनें उसे पुकार दिया—

    आओ भीतर चले आओ बेधड़क

    अपनी बंदूक़ और असलहे वहीं बाहर रख दो

    आस-पड़ोस के बच्चे खेलेंगे उससे

    यह बंदूक़ों के भविष्य के लिए अच्छा होगा

    वह एक बहादुर सैनिक की तरह

    मेरे सामने की कुर्सी पर बैठा

    और मेरे आग्रह पर होंठों को चाय का स्वाद भेंट किया

    मैंनें कहा—

    कहो कहाँ से शुरुआत करें?

    उसने एक गहरी साँस ली, जैसे वह बेहद थका हुआ हो

    और बोला—उसके बारे में कुछ बताओ

    मैंनें उसके चेहरे पर एक भय लटका हुआ पाया

    पर नज़रअंदाज़ कर बोला—

    उसका नाम समसारा है

    उसकी बातें मज़बूत इरादों से भरी होती हैं

    उसकी आँखों में महान करुणा का अथाह जल छलकता रहता है

    जब भी मैं उसे देखता हूँ

    मुझे अपने पेशे से घृणा होने लगती है

    वह ज़िंदगी के हर लम्हे में इतनी मुलायम होती है कि

    जब भी धूप भरी छत पर निकल जाती है नंगे पाँव

    तो सूरज को गुदगुदी होने लगती है

    धूप खिलखिलाने लगती है

    वह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत पत्नियों में से एक है

    मैंनें उससे पलटकर पूछा

    और तुम अपनी के बारे में कुछ बताओ...

    वह अचकचा-सा गया और उदास भी हुआ

    उसने कुछ शब्दों को जोड़ने की कोशिश की

    मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता

    वह बेहद बेहूदा औरत है, और बदचलन भी

    जीवन का दूसरा युद्ध जीतकर जब मैं घर लौटा था

    तब मैंने पाया कि मैं उसे हार गया हूँ

    वह किसी अनजाने मर्द की बाँहों में थी

    यह दृश्य देखकर मेरे जंग के घाव में अचानक दर्द उठने लगा

    मैं हारा हुआ और हताश महसूस करने लगा

    मेरी आत्मा किसी अदृश्य आग में झुलसने लगी

    युद्ध अचानक मुझे अच्छा लगने लगा था

    मैंनें उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला—

    नहीं मेरे दुश्मन ऐसे तो ठीक नहीं है

    ऐसे तो वह बदचलन नहीं हो जाती

    जैसे तुम्हारे सैनिक होने के लिए युद्ध ज़रूरी है

    वैसे ही उसके स्त्री होने के लिए वह अनजाना लड़का

    उसने मेरे तर्क के आगे समर्पण कर दिया

    और किसी भारी दुख में सिर झुका दिया

    मैंने विषय बदल दिया ताकि उसके सीने में

    जो एक ज़हरीली गोली अभी घुसी है

    उसकी कोई काट मिले

    मैं तो विकल्पहीनता की राह चलते यहाँ पहुँचा

    पर तुम सैनिक कैसे बने?

    क्या तुम बचपन से देशभक्त थे?

    वह इस मुलाक़ात में पहली बार हँसा

    मेरे इस देशभक्त वाले प्रश्न पर

    और स्मृतियों को टटोलते हुए बोला

    कि मैं एक रोज़ भूख से बेहाल अपने शहर में भटक रहा था

    तभी उधर से कुछ सिपाही गुज़रे

    उन्होंने मुझे कुछ अच्छे खाने और पहनने का लालच दिया

    और अपने साथ उठा ले गए

    उन्होंने मुझे हत्या करने का प्रशिक्षण दिया

    हत्यारा बनाया

    हमला करने का प्रशिक्षण दिया

    आततायी बनाया

    उन्होनें बताया कि कैसे मैं तुम्हारे जैसे दुश्मनों का सिर

    उनके धड़ से उतार लूँ

    पर मेरा मन दया और करुणा से भरने पाए

    उन्होंने मेरे चेहरे पर ख़ून पोत दिया

    कहा कि यही तुम्हारी आत्मा का रंग है

    मेरे कानों में हृदयविदारक चीख़ भर दी

    कहा कि यही तुम्हारे कर्तव्यों की आवाज़ है

    मेरी पुतलियों पर टाँग दी लाशों से पटी युद्ध-भूमि

    और कहा कि यही तुम्हारी आँखों का आदर्श दृश्य है

    उन्होंने मुझे क्रूर होने में ही मेरे अस्तित्व की जानकारी दी

    यह सब कहते हुए वह लगभग रो रहा था

    आवाज़ में संयम लाते हुए उसने मुझसे पूछा :

    और तुम किसके लिए लड़ते हो?

    मैं इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं था

    पर ख़ुद को स्थिर और मज़बूत करते हुए कहा :

    हम दोनों अपने राजा की हवश के लिए लड़ते हैं

    हम लड़ते हैं क्योंकि हमें लड़ना ही सिखाया गया है

    हम लड़ते हैं कि लड़ना हमारा रोज़गार है

    उसने हल्की हँसी के साथ मेरी बात को पूरा किया—

    दुनिया का हर सैनिक इसीलिए लड़ता है मेरे भाई

    वह चाय के लिए शुक्रिया कहते हुए उठा

    और दरवाज़े का रुख़ किया

    उसे अपनी बंदूक़ का ख़याल रहा

    या शायद वह जानबूझकर वहाँ छोड़ गया

    बच्चों के खिलौने के लिए

    बंदूक़ के भविष्य के लिए

    उसने आख़िरी बार मुड़ कर देखा तब मैंने कहा—

    मैं तुम्हें कल युद्ध में मार दूँगा

    वह मुस्कुराया और जवाब दिया—

    यही तो हमें सिखाया गया है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विहाग वैभव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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