Font by Mehr Nastaliq Web

बुश्शर्ट

bushshart

रवि यादव

रवि यादव

बुश्शर्ट

रवि यादव

और अधिकरवि यादव

    काठ की खूँटियों में लटकता रहता शरीर का एक हिस्सा

    जिसके हिस्से में नहीं रहता सर्वथा शरीर का सुख

    सबसे महीन बातों का जानकार सबसे अधिक चुप रहता

    दरवाज़े के पीछे या कि आलमारी में बंद

    कभी अलगनी पर सूखता तो कभी भीगता

    कितने जीवन जिए इस शरीर में

    वो हुबहू सब कुछ जानता

    कभी बाज़ुओं पर रगड़कर पोंछता गीली आँख तो कभी नाक

    उसे मालूम होती जगहें चुपचाप पसर जाता शांत होकर

    जब कभी अपनी बुश्शर्ट झाड़ता हूँ

    तो दुनिया के कितने स्पर्श उभर आते हैं

    इसके रंगीन शरीर पर

    कितनी हवाएँ झीने रेशों से बह जाती हैं बाहर

    जिनकी साँसों में घुली होती हैं कितनी स्मृतियाँ

    इसकी सतह पर छुए हाथों के थाप

    और कितने आलिंगन

    सबके बीच की कड़ी रहा यह

    हमारे लिए कभी जूठन नहीं बने बुश्शर्ट

    अपने सबसे प्रिय व्यक्तियों के चले जाने पर

    उनकी गंध की स्मृति लिए

    चिपका रहा बुश्शर्ट

    स्रोत :
    • रचनाकार : रवि यादव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    संबंधित विषय

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY