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बुद्ध पर कुछ कविताएँ (भाग-दो)

buddh par kuch kavitayen (bhaag do)

सुशील कुमार

सुशील कुमार

बुद्ध पर कुछ कविताएँ (भाग-दो)

सुशील कुमार

और अधिकसुशील कुमार

    एक

    बुद्ध मेरा सबसे प्रिय व्यक्ति है

    सब जगह सबको टटोल कर देख लिया मैंने

    ऑफ़िस में घर में सड़क पर

    दोस्तों में रिश्तेदारों में बाज़ार में

    होटलों में मयख़ानों में...

    पूजाघरों में भी,

    नहीं मिला मुझे कोई भी बुद्ध-सा

    दो

    बुद्ध मेरा सबसे प्रिय मित्र है

    सबसे बेहतरीन शौक है मेरा

    मेरा धन है वह, मेरा घन है

    और मेरा मन भी है।

    तीन

    बुद्ध से अधिक भावुक अधिक उदार

    इरादों में उतना ही बज्र

    पर उतना तरल और रुई-सा नरम

    भावप्रवण, मोम-सा विह्वल

    मुझे और कोई नहीं मिला

    चार

    बुद्ध की कहन

    बुद्ध की दशा

    बुद्ध की दिशा

    बुद्ध की चेतना

    बुद्ध का उठना, बैठना

    ध्यानमग्न होना

    उपदेश देना

    संसार की करुणा से पोर-पोर भीगी हुई है

    यह जितनी निश्छल और ममतालु है

    उतनी ही रागात्मक और प्रेम से उब-डूब

    पाँच

    बुद्ध सब बु‌द्धि का सार है...

    पर सबसे अलग सबसे नायाब

    बुद्ध आस्तिकों का अनिश्वरवादी है

    नास्तिकों का ध्यानमग्न आनंदमूर्ति है

    छह

    बुद्ध का चेहरे पर पसरी शांति में

    अनंत ब्रह्माँड समाया है

    जो मेरे भीतर सहज ही उत्तर आती है

    उसके आलोक से मेरे अदर का दीया

    जलने लगता है

    सात

    बुद्ध स्थिर है

    पर कायर नहीं,

    लड़ता नहीं है बुद्ध

    किसी का वध करता है

    वह हमारे विवेक के चरम बिंदु पर

    ज्ञान की पूरी शक्ति से प्रहार करता है

    और भीतर तक मुझे आलोडता है

    आठ

    बुद्ध किसी क्षत्रिय कुल में जन्मा होगा

    पर वह किसी कुल-जाति का नहीं

    पूजा-पाठ बलि-वेदी तंत्र-मंत्र यज्ञादि पर

    उसे तनिक भरोसा नहीं

    बुदध पाखँड का विरोध शब्दों से नहीं करता

    ध्यान, जान और बोध से करता है

    नौ

    बुद्ध किसी को आशीर्वाद भी नहीं देता

    चुप रहता है हमेशा

    फिर भी हम उसके पास बैठकर

    लीन हो जाते हैं किसी अजात सत्ता से

    और धन्य हो उठते हैं!

    दस

    वह तथागत है और प्रबुदध भी पर

    किसी को आश्वासन देता है

    किसी से मंत्र पढ़ता-पढ़वाता है

    केवल अपने पास बैठाता है

    और स्वयं में लय होने का इशारा करता है

    ग्यारह

    बुद्ध किसी से कुछ लेता नहीं

    सबको देता है

    और सिर्फ़ देता ही जाता है

    बुद्ध का भिक्षाटन भी सबसे अलग है

    भीख से वह केवल पेट की आग बुझाता है

    मगर भीख देने वात्रों की मन की आग बुझा देता है

    बारह

    बुद्ध की आवाज़

    सभी दुनियावी स्वरों और सब ध्वनियों से अलग है

    वहाँ कोई साज-बाज नहीं है

    वहाँ कोई भजन-कीर्तन भी नहीं है

    मंत्रोच्चारण धूप बत्ती

    बलि के पशुओं की कराह

    कोई याजिक शंखनाद

    वहाँ तो घनघोर चुप्पी है!

    आत्मचिंतन में लवलीन

    स्वांस के झूले पर झूलता

    ध्यान मुद्रा में डूबा

    चिर निद्रा में गोते लगाता

    पूरा सचेतन स्थिर मानव काया है

    बुद्ध!

    तेरह

    बुद्ध कोई तृष्णा नहीं,

    कोई कामना

    सूत दारा महल से आसक्त नहीं वह

    कंचन कामिनी कीर्ति सबका त्याग करता है

    उसे विपासना प्रिय है, ध्यान प्रिय है

    और वह सब अप्रिय है जो

    जो उसे जीवन को उस तरह जीने से रोकती है।

    चौदह

    बुद्ध यशोधरा के लिए विलाप नहीं करता

    बुद्ध को राहुल की भी दुश्चिंता नहीं

    लेकिन बुद्ध तो देवदत्त के तीर से बिंधे

    हंस को भी बचाता है!

    बुद्ध मुझको तुमको सबको

    स्वयं में ही

    पूरी सृष्टि से एकाकार करता है

    और प्रेम की अविरल धारा में बहाता है

    चेहरे से फूटती

    उसकी अजस्त्र मुस्कान और कांति इसकी गवाह है

    बुद्ध मेरी थाती है

    वह मुझे रोग बुढ़ापा आऔर मृत्यु के बारे में बताता है

    जीवन में मृत्यु सिखाता है

    और उसके भय से मुक्त करता है मुझे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुशील कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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