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फूले काँसन ते ख्यालयि,

घुँघुवार बार मुँहुँ चूमयिं।

बछिया-बछरा दुलरावयि,

सब खिलि-खिलि, खुलि-खुलि ख्यालयि।

बारू के ढूहा ऊपर,

परभातु-अयिसि कसि फूली!

पसु पंछी मोहे-मोहे

जंगलु मा मंगलु गावयिं।

बरसायि सतऊ गुनु चितवयि

कँगला किसान की बिटिया।

तितुली के पाछे दउरयि

थकि-थकि कयि ल्वाटयि-प्वाटयि;

लुकि-छपि कयि ब्यरझरियन मा

तित्तुर के बच्चा पकरयि।

रोटी का कउरु चलावयि,

कबरा कुतवा ललचावयि;

पीठी पर बिल्लो रानी

न्यउरा ते खीसयि काढ़यिं।

लरिकईं पूर खजाना

कँगला किसान की बिटिया।

भ्वरहरे जगि वह आवयि,

टिल्लन पर बेनि बजावयि।

सब गोरु पाछें दउरयिं,

फिर चाटयिं, चुकरयिं, हुँकरयिं,

द्याखतयि पुँछारी नाचयिं,

ताल दयि मुरइला उछरयिं।

साधे सनेहु की जउरी,

जर-चेतन बाँधे घूमयिं।

बन-कन्या-असि किलकारयि

कँगला किसान की बिटिया।

जब आगि भरी आँखिन ते

सबिता दुनिया का द्याखयिं,

दस दिसि ते बादर दउरयिं

भरि करियारी के फीहा;

मुँह झाँपि लेयिं द्यउता का—

कुम्हिलाय कहूँ कुँआरी;

जब रिमिक झिमिकि झरि लागयि,

बिरवा तकि छतुरी तानयिं,

कुस डाभन ऊपर पनपयि

कँगला किसान की बिटिया।

दुइ घरी राति बीते पर

वह नदी-तराई घूमयि।

म्यढ़की मछरी तकि-जकि कयि,

गुनगनि-गनि गीतु सुनावयिं।

मँझरा के बीच मड़य्या

वह ऊँचा-खाली दउरयि,

जुगुनू पियार के मारे

ग्वाड़न तर दिया जरावयिं।

वह चली जाय निःकंटक

कँगला किसान की बिटिया।

पयिरा पर पउढ़ी-पउढ़ी,

वह चितवइ चाकु चँदरमा

मुसक्यायिं रूपु छबि छकि छकि

प्रेम की अरघ अँजुरी भरि,

भ्याटयिं अकास ते तारा—

दुगनायि दिपित देंही की।

बप्पा के तप की वेदी,

अम्मा की दिया—चिरय्या

धनवान की द्वासरि दुनिया

कँगला किसान की बिटिया।

स्रोत :
  • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 100)
  • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
  • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
  • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  • संस्करण : 1998

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