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समकालीन दोहा

samkalin doha

तैयब हुसैन पीड़ित

तैयब हुसैन पीड़ित

समकालीन दोहा

तैयब हुसैन पीड़ित

और अधिकतैयब हुसैन पीड़ित

    आज इहाँ कल उहाँ, रोज युद्ध के नाच

    होत महाभारत तबो, शकुनी जाता बाँच

    जवना बड़-तर साल भर रहे मेल के खेल

    अब ओह पर बा छा रहल, बैर-फूट के बेल

    बहिरा बा दिल्ली अउर बहिरे राज बिहार

    जनता बोली जोर से तबे सुनी सरकार

    गंगुआ राजा बनल बा, परजा बाड़न भोज

    कहीं भोज पर भोज बा, कहीं ओज पर ओज

    कुछ फाड़ल कुछ फट गइल संस्कृति के अध्याय

    अब अदमी हो रहल बा, पशु के परयाय

    जहर घोराइल रंग में पिचकारी में नाग

    भूलऽ जे खेलत रहे हिलमिल पुरखा फाग

    बचबऽ आखिर के तरह? डेग-डेग पर घात

    हर छाता में छेद बा, बेमौसम बरसात

    सुविधन के जे कर रहल बा डट के उपभोग

    हमरे-तोहरे बीच में बाटे अइसन लोग

    आन्हर के राज बा, अन्हरे बा सरकार

    इहाँ जे बेची आइना, चउपट कारोबार

    अब बनारस के सुबह अउर अवध के शाम

    दूनों जगहा कर रहल बा बादर आराम

    पहिले धनिक-गरीब, फेर बड़ छोट समाज

    राजनीति के कोढ़ अब, जातवाद के खाज

    जब-जब पछेया चलत बा, चीखत लागे नीम

    जब से ओके ले गइल, बहुराष्ट्रीय टीम

    बुलबुल पासे बघनखा, कोइल पास गुलेल

    हर डाली पर बइठ के उल्लू करे कुलेल

    सातों रंग बिखर गइल, इन्द्रधनुष के आज

    एह सीमा तक हो गइल बदरंग समाज

    चिंउटी से हाथी मरे, छछून्दर से साँप

    बाकी बे कारण मरत बा मनई आप

    एक तरफ जंगल कटल, अउर खुलल उद्योग

    दोसरा ओर उगा रहल गमला में वन लोग

    जब से भारत में भइल महामुर्ख के खोज

    तब से बइठल डाढ़ के काली काटे रोज

    रोहित से लगलन कहे हरिश्चन्द्र हो खिन्न

    हम भोगलीं दुख, लाल तू रस्ता चुनले भिन्न

    खुद ना चललन जे ओकर देश चलावल काम

    एक करिया रंग, फेर कमरी ओढ़ले श्याम

    दुनिया के दादा रहे बनल काल्ह जे आप

    ओकरो देखऽ मिल गइल आज बाप के बाप

    स्रोत :
    • पुस्तक : अनसोहातो (कविता-संग्रह) (पृष्ठ 27)
    • रचनाकार : तैयब हुसैन पीड़ित
    • प्रकाशन : शब्द संसार, पटना
    • संस्करण : 2011

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