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लंका आ रावन

lanka aa ravan

ब्रजभूषण मिश्र

ब्रजभूषण मिश्र

लंका आ रावन

ब्रजभूषण मिश्र

और अधिकब्रजभूषण मिश्र

    जगह-जगह

    बसल बडुए

    सोने के लंका,

    जगह-जगह

    रावन के राज बा।

    मोहित बाड़ें

    राम-लखन

    सुपनेखिया रूप पर,

    आपस में लड़त बाड़ें।

    ललचात बाड़ी सीता

    सोना के मिरगा पर,

    अपहरण के देत बाड़ी

    मौका।

    आज के बनी जटायु?

    जे रावण से लड़ी,

    आपन पाँख कटवाई

    परमारथ में

    घवाहिल हो के

    छटपटाई।

    के बनी हनुमान?

    जे भगती में

    रामजी से सकती लेके

    लांघ जाई सात समुन्दर,

    सीता के शोक हरी,

    लंका के अशोक वन से

    'अ' के हरण करी,

    लंका के दहन करी।

    आज के बानरी सेना

    खाली उधम मचावत बा,

    बान्ही कइसे सेतु,

    पुल के नीचे

    पलीता लगावत बा।

    सभे आपन भूमिका

    भुलाये लागल बा,

    एही से अच्छाई

    अलोपित हो रहल बा।

    काहेकि

    बाहरी लंका के अलावे

    सबका भीतरी बसल बा

    कई-कई गो लंका,

    कई-कई गो बा रावन।

    स्रोत :
    • पुस्तक : खरकत जमीन बजरत आसमान (पृष्ठ 68)
    • रचनाकार : ब्रजभूषण मिश्र
    • प्रकाशन : वनांचल प्रकाशन, तेनुघाट (बोकारो)
    • संस्करण : 2015

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