(भिखारी ठाकुर के प्रति)
साइन्स कहेला—
कवनो चीज के नाश ना
रूप-बदलाव होला,
भिखारी मरल नइखन।
ठोस जब स्थूल रूप छोड़ी
ओकर फइलाव धरती से आकाश नापे लागी
भिखारी आज जन-जन के भावना में बाड़न।
तू मानऽ भा मत मानऽ!
हम त देखत बानी—
सूरदास के कनझप्पा पेन्हले
ठेहुना तक धोती, मिरजई आ चश्मा में ओ आदमी के
जवन समैना से बाहर ठसम-ठस्स भीड़ में
घेराइल
पहिले त गंगा, जनमभुई, कृष्ण आ शिव के कीर्तन कइलक ह
फेर राम के वंशावली के चिट्ठा लेले ठार बा।
'भाई-विरोध' के कुटनी
'बेटी-बेचवा' के 'पंडित'
आ 'बिदेसिया' के 'बटोही'
का भुला सकेला?
जब ले कोख से जनमावल लाल
ओकरा माई के हवाले ना होई
दहेज के बूढ़ राछस कमसीन बेटी के लीलत रहीहंन
मेहर का चलते गंगा असनान गएल माई
पानी में ढकेल दिहल जाई
आ
बेकती-बेकती के घर
कवनो बँहरवासू दुश्मन फोड़त रही।
एह से आवऽ!
हँसा-हँसा के पेट फुला देवेवाला
ओ लबार के धँसल पेट कावर ताकीं
औरत के सुख-दुख भोगेवाला जवान लइका के
विलखत बीबी पर गौर करीं
घर में बेमार छोड़ आयेल बाल-बच्चा वालू
एह सरंगी-सितार पर ताल तुड़त बुढ़ऊ के
दरद अंगेजी
ना तऽ,
भिखारी ना रहिहंन, ना रहिहंन, ना रहिहंन
चाहे तू उनका के मंदिर में कैद क दऽ
भा उनका पुतरा के
जयन्ती का बहाने बटोराइल लोगन के गोल में
साले-साल जेतना जगेह खोलऽ-तोपऽ!
- पुस्तक : अनसोहातो (कविता-संग्रह) (पृष्ठ 13)
- रचनाकार : तैयब हुसैन पीड़ित
- प्रकाशन : शब्द संसार, पटना
- संस्करण : 2011
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