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भैंसे

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आशीष गौड़

आशीष गौड़

भैंसे

आशीष गौड़

और अधिकआशीष गौड़

    बँधी रात भर जाड़े में,

    अपने वक्षों में रात को बंद किए,

    दूध नहीं,

    अधिकार रोके खड़ी।

    पाल चरवाहे को,

    माँग रही थी

    सिर्फ़ पानी की एक धार,

    बदन गीला करने को।

    अपने अकेलेपन में

    ग़ालिब, फ़ैज़ को याद करते

    डकार जाती

    साम्राज्य का आधिपत्य

    और वर्चस्व।

    विशालकाय, विस्मित

    आँतों के कारख़ानों में,

    सूखे खेत,

    भरे जंगल

    और पूरी नैसर्गिकता

    डकार गई।

    देह की अंतःकूहों में,

    कुबड़ी मोटी मक्खियाँ

    डार्विन नहीं,

    बल्कि सत्ता के उत्क्रांत से विकसित

    रक्त-चूसक

    डंक मारती थीं।

    अंतड़ियों के मंथन ने

    हक़ को गोबर कर दिया,

    और दूध

    मालिक के कंठ उतर गया।

    खुर और सींग

    ज़मीन पर रगड़,

    उत्पीड़न का अवसाद

    बाँटा उसने

    बाक़ी सब भैंसों से।

    ढलते सूरज को

    विषाण पर उठाए,

    झुँड में

    मानवता के विकास की

    समीक्षा हेतु।

    गर्दन पर साँखलों के खुले सिरे लटकाए,

    राज्य-प्रमाणित मदमस्ती में

    सभ्यता के अधिकृत अध्यायों पर

    पेशाब करती,

    गोबर बिखेरती वह निकली—

    और प्रगति की भाषा को

    गीला करती।

    भैंसे,

    कालचक्र के कंबल ओढ़े

    सींच रही हैं पीढ़ियाँ,

    रीढ़ के रक्त से।

    स्रोत :
    • रचनाकार : आशीष गौड़
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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