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भोली-भाली सुकुमारी,

कवि को अपना कभी कहना,

और कभी भी तुम उसका विश्वास करना,

तुम पर क्रोध करे तो डरना, क्या डरोगी?

लेकिन तुमको प्यार करे तो ज़्यादा डरना।

उसके पास जाना, उससे ब्याह करना,

सोच, कि दो हृदयों का मधुमय गठबंधन है

प्यार हमारा,

बाँधोगी अपने झीने-झीने आँचल में,

कुसुम-कुमारी,

एक दहकता-सा अँगारा।

उसके भाव विचारों में तूफ़ान मचलते

पर उसका अधिकार कुछ भी

अपने ऊपर,

उसके सिर को घेर रही जो विद्युत-माला

भस्म तुम्हारे कुतल होंगे

उसको छूकर।

दुनिया अंधी है जो उसको साधु समझती

और बाद को उसकी निंदा

करती फिरती,

उसके मुख में नहीं सर्प का दंत विषैला

किंतु भ्रमर की जीभ कि जिससे

रसमय कलियो के उर की पंखुरियाँ चिरती।

डरो इसको सोच

कि कवि अपने हाथों से

कभी तुम्हारा पावन अवगुठन फाड़ेगा।

वह अनजाने-अनजाने में

कभी तुम्हारा गला घोंटकर

तुम्हें बादलों से भी ऊपर पहुँचा देगा।

स्रोत :
  • पुस्तक : चौंसठ रूसी कविताएँ (पृष्ठ 79)
  • रचनाकार : फैदोर त्यूतशेव
  • प्रकाशन : राजपाल एंड संस
  • संस्करण : 1964

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