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बसंती-बहार

basanti bahar

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

बसंती-बहार

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    हरियरि धोती धारे,

    पियरे दुसाला डारे,

    उतरी बसंती-बहार

    धरा की लोनी अँगनइया।

    चिरियाँ सवारे चहकीं,

    डहडही डारे डहकीं,

    बगियन कलियाँ महकीं,

    सुरुज नरायन भोरे,

    सोनिल ललौंछे गोरे,

    तानैं किरन केरि तार,

    उमिरि बारी लरिकइयाँ।

    उजल उजल जलु,

    बिकसा कमल-कुलु

    अधमुँद कुमुद-दलु

    ललचाने भौंरा घौरइँ

    तितुली ममाखी दौरइँ,

    तलिया हरी की ससुरारि

    गरुण-सी बोलैं सरसइयाँ।

    जौ की चिकनिया पाती,

    चना की मटक माती,

    गोहूँ कि गमकैं पाँती,

    फुलियानी अहीं लहकै,

    देखि-देखि हियरा बहकै,

    सरसौं लहरियादार,

    पवन बहै पुरुवइया।

    मटर उजलि फूले,

    असमानी अकसा झूले

    छिनु-छिनु बथुवा ऊले,

    म्याढ़न नबेली धावइँ

    बुलबुल तानै गावइँ,

    पपिहा की पी-पी पुकार,

    बजति मानउँ सहनइया।

    सतरंग अँचरा लहरै,

    नेह की पताका फहरै,

    रंगी कितबिया छहरै,

    छिटकैं छबीली अलकइँ

    सुखदा सुहानी पलकइँ,

    तुन तुन बाजइ सितार,

    बिराजी सरसुती मइया।

    उतरी बसंती बहार

    धरा की लोनी अँगनइया।

    16 जनवरी 1968

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 21)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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