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बंदरगाह

bandargah

अनुवाद : सुरेश सलिल

कार्ल सैंडबर्ग

और अधिककार्ल सैंडबर्ग

    परस्पर गुँथी और लोनाई दीवारों से होता हुआ

    उन दरवाज़ों की बग़ल से गुज़रा

    जहाँ भूख से धँसी आँखों वाली औरतें

    ताक रही थीं टुकुर-टुकुर,

    बुभुक्षित हाथों की प्रेतछायाओं से ग्रस्त

    उन परस्पर गुँथी और लोनाई दीवारों के बाद

    मैं अचानक आन पहुँचा शहर के छोर पर—

    झील के नीलवर्णी उफ़ान के सम्मुख,

    धूप में चमकती-बिछलती, झील की उत्ताल तरंगे

    जहाँ ख़ुद को चूर-चूर किए दे रही थीं

    फुहारों के प्रहार सहते एक तटीय मोड़ पर।

    और सामुद्रिकों का एक मँडराता तूफ़ान

    बड़े-बड़े सफ़ेद पंखों का वितान

    और उड़ते हुए उनके अधोमुख श्वेत उदर

    उन्मुक्त आकाश में निर्बंध विचरते—दिशाएँ बदलते।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 57)
    • रचनाकार : कार्ल सैंडबर्ग
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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