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बैचलर

baichlar

गाम सँ आबैत काल

सिदहा-बाड़ी सँ भरल बोरा मे

माय राखि दैत अछि

एक मोटरी विश्वास

जखन पिताजी केँ करैत छी प्रणाम

सिनेह सँ कान्ह पर हाथ राखि

असथीर सँ जेबी मे ध' दै छथि

कैंचाक संग बहुतो आस

हम बस मे बैसि

चलि दैत छी शहर दिस

सभ सड़क कात मे ठाढ़

देखैत रहै छथि, ओझर होइत गाड़ी केँ

बड़ी काल धरि

एतय

दुनियाँ सँ अनभुआर

लॉजक छोटछीन कोठरी मे

औनाइत रहै छी

फूटैत लाबा सन

बरोबरि अखियासैत छी लक्ष्य

अक्सरहाँ सन्हिया जाइत अछि

भविष्यक अदंक

परिवारक मनोरथ केँ

माथ पर उठौने

पीसमपीस भीड़ मे

कयल जा रहल छी लतखुरदनि

कियो देखैत होयत औखन

घोड़ा पर बैसल

दिव्य राजकुमार केँ

जे स्वप्नलोक सँ आबिक'

ल' जेतै ओकरा अपना संग

ओकर सभटा लिलसाक पूर्ति लेल

रोपि देतै एकटा कल्पवृक्ष

हमरा लगैत अछि

ओहि राजकुमारक अस्तित्व लेल

हमहीं होयब जिम्मेवार

रोज राति मे

उकडू भ' पड़ि रहै छी

ओछाओन पर

पैर सोझ करबाक प्रयास मे

माथ ठेकि जाइत अछि देबाल मे

कछमछाइत-छटपटाइत

खन करोट फेरैत

हम सूति रहै छी

भोरहरिया धरि

मुदा

सगर राति जागल रहैत अछि

विश्वास, आस, मनोरथ लिलसा

पेटकुनियाँ लधने

हमरे सिरहन लग।

स्रोत :
  • पुस्तक : पेटकुनियाँ लधने प्रश्न (पृष्ठ 33)
  • रचनाकार : सुमित मिश्र गुंजन
  • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
  • संस्करण : 2024

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