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बहुत दिनों से मोहब्बत नहीं की

bahut dinon se mohabbat nahin ki

सारिका श्रीवास्तव

सारिका श्रीवास्तव

बहुत दिनों से मोहब्बत नहीं की

सारिका श्रीवास्तव

और अधिकसारिका श्रीवास्तव

    बहुत दिनों से मोहब्बत नहीं की

    क्योंकि इन दिनों

    मोहब्बत भी

    राजनीति से परे नहीं हो सकती।

    दिल कहता है

    चलो…एक बार और।

    आजकल तलाशें

    वर्चुअल हो गई हैं।

    बिना किसी भूमिका के

    मैं इंस्टाग्राम खोलती हूँ।

    इंस्टाग्राम खुलते ही

    यूजीसी एक्ट

    नारे में बदल जाता है,

    बहस गाली में,

    और असहमति

    देशद्रोह में।

    एक पोस्ट,

    फिर दूसरी

    ज़हर की

    लगातार ख़ुराक।

    कौन तय करता है

    कितना सोचना वैध है?

    कितना पढ़ना ख़तरनाक?

    कितना सवाल

    राष्ट्र-विरोधी?

    अफ़्रीका, ईरान, फ़िलिस्तीन

    इतिहास

    हर बार

    लहूलुहान होकर

    टाइमलाइन पर लौट आता है।

    उफ़…

    और कितना ज़हर

    भरना बाक़ी है

    लोगों के ज़ेहन में?

    अदम गोंडवी की कविता—

    “मैं… की गली तक

    ले चलूँगा आपको”

    याद जाती है।

    स्पार्टाकस

    किसी एक दिन नहीं बना था,

    उसे रोज़

    चुप रहने को

    कहा गया।

    मैं आगे

    स्क्रॉल करती हूँ।

    फिर आती है

    एप्सटीन की सूची

    जहाँ सत्ता

    नंगी नहीं होती,

    बस

    बेनक़ाब होती है।

    देह की

    सदियों पुरानी दास्तान।

    मंटो

    अश्लील कहे गए,

    फूलन

    अपराधी

    क्योंकि सच

    हमेशा

    अवैध होता है।

    तभी कहीं से

    ‘बजट’ जाता है,

    और भूख, छत, मेहनत

    फिर से

    अर्थशास्त्र बन जाते हैं।

    अब सोचती हूँ

    मैंने इंस्टाग्राम

    क्यों खोला था?

    शायद

    यह जानने के लिए

    कि हम

    अब भी

    ज़िंदा हैं या नहीं।

    या शायद

    ख़ुद को

    याद करने के लिए

    कि मैं

    सिर्फ़ ख़बर नहीं,

    औरत हूँ।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सारिका श्रीवास्तव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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