मैंने एक बाग़ीचा बनाया है, लगता है
किसी ग़लत ज़मीन पर सही अभिव्यक्तियाँ बोई हैं जैसे
ऐसा ग़लत हो जाना, ग़लती नहीं, जगह से चूकना है मात्र,
जैसे आईने में प्रतिबिंब से हो बोलता कोई
न कि ख़ुद से जो आईने में
से जो आईने में खड़ा हो।
मैंने एक बाग़ीचा बनाया है, बातें कर सकूँ
आमने-सामने, सौंदर्य के बीच, ऐसे में जहाँ सदा
मूक और चुस्त मौत हृदय पर हावी है।
दोहराती है वो बार-बार छोड़ो सब बाँधा सामान,
अब शरीर परखता है, दोनों किनारों—को कहीं कुछ नहीं—
केवल सही अभिव्यक्तियाँ—उन्हीं में खोएँ-सँवारते उनको
बन जाना है ख़ुद ही—बाग़ीचा।
जो कुछ भी खो रहा है, सँभालो उसे, कहा था मौत ने मुझे
बड़ी बारीकी से कहीं दूर की स्पानी भाषा में।
जो कुछ भी खोता है, जब तक है, एक ही साथी है
मौत के दूर किनारे तक।
अब तो यह ज़बान कह सकती है सब कुछ।
यह ज़बान जो कभी न हो सकी घृणा की शल्य छुरी
उपकरण सब थे उसमें जो अशुभ को आश्चर्य
में बदल दें। आँखों में आतंक भी समा जाता है
यदि सौंदर्य उसे सँवारे। देखो उस अंध-छिद्र को :
सही अभिव्यक्तियाँ, प्यार से रचा-बसा जो आईने में
न दीख पाए, रचना भी उसमें अर्थहीन।
एक बाग़ीचा अपना, तो हम भी अंग उसके जीवन के,
उसकी निरंतर अलविदाओं के। फूल, बीज और
पौधे हमेशा के लिए मर जाते हैं या जीवन पाते हैं।
छँटाई और पनपने की बीच ढलती ये गर्मी की मीठी शाम
करती है पार ख़ुद अपनी हदों को।
और उसकी ढलती छाया ऐलान करती है वसंत का
ठोस उज्ज्वलता के आगमन का।
या फिर किसी मरणासन्न की स्वप्नहीन स्थिति में भी
निरंतर पनपता जाता है उसका मूल जीव रूप।
बाग़ीचा चाहता है मालिनी देखे उसे मरता हुआ
उसके हाथ कटाई करें और गुड़ाएँ उस
नग्न मिट्टी को पथरीली ज़मीन में घूमते
बर्फ़ीली रात में। बाग़ीचा तो मौत देता है और
ख़ुद भी मौत चाहता है, ताकि बाग़ ही बन के रह सके।
पर जब ग़लत ज़मीन पर व्यक्त हों सही अभिव्यक्तियाँ
तब नहीं बनता कोई समीकरण, सब बंजर ही नज़र आता है।
प्यार पर दावा, अंतरों के बावजूद
रंग देता है दर्द में भी आकाश को गाढ़े नीले रंग से
बन जाता है वह तूफ़ान की शाही बूँद जिसकी बाँहों में
कोई पहुँच जाए दूर अतिदूर, उस पार।
काश, तुम यहाँ साथ होते प्रिये, पर मालिनी हो
और मैं बाग़ीचा, तुम्हीं ने मुझे अपनी पथरीली ज़मीन से
उखाड़ा था।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 165)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
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