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बड़प्पन

baDappan

श्याम दरिहरे

श्याम दरिहरे

बड़प्पन

श्याम दरिहरे

और अधिकश्याम दरिहरे

    स्कूल अबैत छल रोज

    की तँ भने छलै ओकर नाम

    हँ, रम्मन कहै छलै लोक

    नाम रहल होइक किछुओ

    मुदा कहिओ

    नागा नहि छल करैत

    स्कूलमे रेगुलर रहलासँ

    घरमे रुतबा बढ़ैत छैक

    ओकर कहब छलैक।

    कोनो हल्लुक सवाल जहाँ छलखिन

    पुछैत पंडीजी

    कि पिनकि जाइत छल—

    मास्सैब, पूछिकऽ एते हल्लुक प्रश्न

    छोट तँ नहि बनाउ हमरा

    उत्तर यद्यपि हमरा

    एकरो नहि अछि बूझल

    तैओ भारी प्रश्नक अपन रूतबा

    अलगे छैक होइत

    ओकर नहिओ देलासँ जवाब

    प्रश्नक गुरुता

    अपने सन

    भारी बना दैअए हमरो।

    बहुत दिन बाद भेटल रम्मन

    दिल्लीक कनाट प्लेसमे बौआइत

    हालचाल पूछा-आछी भेल

    अपने लागल कहय—

    संसद छल गेल

    छलैक कोनो भरिगर काज

    ओतहिसँ अछि आबि रहल

    फेर सुनौलक भारी-भारी शब्द

    जेना लिबरलाइजेशन, फारेन ट्रेड,

    इनफ्लेशन, इनफारमेशन टेक्नोलोजी

    फेसबुक, ट्वीटर

    आदि-आदि।

    हम तँ तकिते रहि गेलहुँ

    ओकर मुँह

    कते पैघ भऽ गेलए रम्मन।

    अहिना एकदिन आर अभरल रम्मन

    कहलक जे

    आबि रहल अछि वापस

    अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डासँ

    फेर कहय लागल

    एम्बेसी

    पासपोर्ट

    वीसा

    डालर

    एक्सचेंज

    ईमिग्रेसन आदि-आदि।

    अइबेर हम कहलिऐ छगुन्तासँ

    अँए हौ रम्मन!

    तों तँ भऽ गेलह बड़का लोक

    कतेक निकलि गेलह आगु!

    कने लजा गेल

    कहलक—

    हौ भाइ,

    तों तँ ठहरलह हमर

    स्कूलिया दोस

    तोरासँ कोन बड़ाइ

    हमरा ने काज रहैए

    संसदमे, ने अम्बेसीमे।

    अइ सभक कयलासँ प्रयोग

    अगिलापर पड़ैत छैक

    बेश भरिगर प्रभाव

    अपन देलहो पैंच-कर्जाक तगेदाक

    हिम्मति नै करतह लोक—

    कोन साइत कोनो काजे पड़ि जाए

    हिनकासँ!!

    हँसी लागि गेल हमरा

    जा हौ रम्मन

    बड़प्पनक आदति आखिर

    छुटलह नहि तोहर।

    स्रोत :
    • पुस्तक : क्षमा करब हे महाकवि [मैथिली कविता-संग्रह] (पृष्ठ 59)
    • रचनाकार : श्याम दरिहरे
    • प्रकाशन : नवारंभ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2016

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