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बार-बार मिलता है वह हर चौराहे पर

baar baar milta hai wo har chaurahe par

प्रफुल्ल शिलेदार

प्रफुल्ल शिलेदार

बार-बार मिलता है वह हर चौराहे पर

प्रफुल्ल शिलेदार

और अधिकप्रफुल्ल शिलेदार

    उससे मिलने की मंशा मन में हो हो

    फिर भी सामने आकर खड़ा हो जाता है

    निर्भय आँखों से देखता है

    उसकी नज़र मेरी आँखों पर टिकी है

    या मेरी आत्मा पर गड़ी है

    मैं समझ नहीं पाता

    एक बच्चे-सी मुस्कान देकर निकल जाता है

    बार-बार मिलता है वह हर चौराहे पर

    अभी-अभी खचाखच भरे बाज़ार में

    रास्ते के किनारे भौचक्का सा खड़ा था

    अपना खोया हुआ चश्मा ढूँढ़ रहा था

    पूरा भारत स्वच्छ करने की बात कहकर

    चश्मा ले गया था कोई

    पहले उसकी लाठी छीन ली अब चश्मा भी ले गए

    कमर पर लटकी डिबिया वाली एक घड़ी बची है

    जिसमें बजता समय शायद ही उनके काम का हो

    तुम्हारे चश्मे से हमें सब कचरा

    साफ़ दिखाई देगा कहकर

    आँखों के सामने चश्मा निकालकर ले तो गए

    लेकिन मेरे चश्मे से तो

    सालों पुराने ख़ून के धब्बे भी

    साफ़ दिखाई देते हैं

    उन्हें कैसे साफ़ करेंगे पता नहीं

    बुदबुदाते राह टटोलते चलने लगा

    अभी-अभी सदन की दीवार पर टंगे पोर्ट्रेट से

    नीचे उतर आया था

    बहुत उदास होकर देख रहा था

    उसकी हत्या की साज़िश रचने वाले

    सफ़ेद खादी पहनकर

    बहुत छद्म हँसी हँसकर

    उसी की जयजयकार कर रहे थे

    इस घेरेबंदी में कैसे फँस गया हूँ

    अपहरण किया गया है मेरा

    दृश्य के बीचो-बीच बैठकर हैरानी से

    शून्य में देख रहा था

    थोड़ी-सी आशा मन में बचाकर

    फिर से अपने पोर्ट्रेट में जाकर बैठ गया

    उसने अभी-अभी रास्ते से गुज़रता जुलूस देखा

    हाथ में किसी रथ की डोर थामे था कोई

    पीछे जा रहे थे कई लोग जुनून में

    समुंदर से हिमालय तक उन्हें बनाना था धर्मराष्ट्र

    इस भूमि से हटाने थे बाकी सभी धर्म

    उन्हें ताले खोलने नहीं

    ताले लगाने थे मस्तिष्क में

    व्याख्यायित कर रहे थे धर्म को

    हमारी व्याख्या में शामिल हो जाओ

    या फिर मारे जाओ

    जुलूस में घुसकर वह सवाल पूछने लगा

    किस धर्म की बात कर रहे हो तुम

    आत्मा की डोर खोलना तो दूर

    तुम तो गले में रस्सी बाँधकर

    ले जा रहे हो इंसानों को

    दरिंदगी की ओर

    वह अभी-अभी बैठा था सेंट्रल लाइब्रेरी में

    कुछ परेशान-सा दीख रहा था

    एक मोटी-सी किताब हाथ में लेकर

    बारीकी से एक-एक पन्ना पढ़ रहा था

    कुछ पंक्तियों के नीचे लाइनें खिंची दिखीं

    कुछ के सामने लाल स्याही से प्रश्नचिह्न अंकित किए थे

    कुछ शब्दों पर काली स्याही से गोल किया था

    बहुत सारी काटपीट थी पेंसिल से कुछ लिखा था

    कुछ सूचनाएँ थीं कुछ आदेशनुमा वाक्य लिखे थे

    कुछ पन्ने फटने की कगार तक चुके थे

    बेचैन होकर बाबासाहब को फ़ोन लगाकर

    कुछ पूछ रहा था कुछ बताए जा रहा था

    मैं जानता हूँ वह ख़त्म नहीं हुआ

    वह बार-बार मिलता है हर चौराहे पर

    भीड़ में लोगों से मिलकर बतियाते दीखता है

    श्रमजीवियों के साथ पैदल चलते दिखता है

    बुद्धिजीवियों के मस्तिष्क में प्रश्न खड़े करता है

    कम से कम ज़रूरतों के साथ

    बहुत सादगी से किसी बस्ती में रहता है

    सत्य के लिए जूझता है

    असल में एक क़तरा बचा हुआ है उसका

    हर किसी की आत्मा में

    जिसकी वजह से

    हर कोई मनुष्य कहे जाने के

    योग्य बनता है

    वह अभी फिर से रू-ब-रू हुआ राजधानी में

    न्याय-देवता की चौखट पर

    मैं कविता पर चल रहे अश्लीलता के मुक़दमे में

    गवाही देकर बाहर रहा था

    मुझे देखकर उसने कहा

    कविता को इंसाफ़ दिलाने की यह जगह नहीं है

    क़रीब आकर पूछने लगा वसंत गुर्जर कैसा है

    मैंने कहा : इस दुनिया में

    तुम्हारे पीछे चलने वालों का

    क्या कभी भला हुआ है

    छुटकारा दे दो मुझे भी तुम अपने से

    छोड़ दो मेरा पीछा

    अब नहीं रहे तुम्हारे दिन

    असत्य की प्रयोगशाला की

    परखनली बनाया जा रहा है तुम्हें

    उठा लो चरख़ा पकड़ो बग़ल में

    जाकर देखो साबरमती कितनी बदल चुकी है

    पहचान नहीं पाओगे कुछ भी

    यों बार-बार जीवन की हर राह पर मत मिलो

    तुम लाइब्रेरी की अलमारियों में बंद रहो

    दीवार पर टँगे पोर्ट्रेट में डटे रहो

    चौराहों के बीचो-बीच बुतों में खड़े रहो

    या तुम शहर का सबसे बड़ा एमजी रोड बने रहो

    बार बार रास्ते पर उतरकर सामने आओगे

    तो फिर से मारे जाओगे

    तुम नहीं हो तो तुम्हारी प्रतिमाओं पर

    दागी जा रही हैं बंदूकें

    तुम नहीं हो फिर भी तुम्हारा अपहरण किया जा रहा है

    तुम नहीं हो तो तुम्हारे मुखौटों का चलन

    देखो कितना बढ़ गया है

    तुम्हारे अहिंसक कंधों पर बंदूक़ रखकर

    निशाना साधा जा रहा है

    तुम इस धरती की धमनियों में बहते ख़ून में

    नमक की तरह घुले हो

    सारी सीमाएँ लाँघकर दुनिया भर में फैले हो

    इतने ध्वंस के बाद भी

    हर राह पर हर चौराहे पर खिले हो

    तुम मुझे बार-बार हर क़दम पर मिले हो

    तुम हो इस शरीर में अब तक बची हुई आँच

    तुम हो इस बढ़ते अँधेरे में

    आत्मा में प्रदीप्त साँच।

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रफुल्ल शिलेदार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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