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बार-बार

baar baar

जनमेजय

जनमेजय

बार-बार

जनमेजय

और अधिकजनमेजय

    वह-वही लड़की थी

    पारस की छुअन वाली जो

    वासना के दमघोटू घँटों को

    संगीत में बदल देती थी

    और मेरी प्रश्नाकिंत पीड़ा

    धीरे-धीरे एक लय में

    अपना उत्तर अर्जित करने लगती थी।

    लेकिन मानसून के एक भारी मौसम

    के बाद वह चली गई

    अपने पीछे दीवारों पर

    काई की तरह जमे शब्द छोड़कर।

    शब्द! जिन्हें अब अक्टूबर का तीखापन

    काट-छाँट कर सर्दियों की ओर

    ढकेल देता है : बार-बार।

    स्रोत :
    • रचनाकार : जनमेजय
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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