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औरत

aurat

रश्मि रमानी

और अधिकरश्मि रमानी

    औरत नहीं जानती

    अपने औरत होने का अर्थ

    साधारण होती है वह आसमान की तरह

    पर, अनभिज्ञ नहीं

    भीतर की भूल भुलैया से

    औरत नहीं जानती

    अपने औरत होने का जादू

    उसकी देह की कमनीयता

    बदल जाती है चट्टान में

    और, दर्द की दीवार को तोड़कर

    फूटते हैं नस्लों के अँकुर, आविष्कृत होती है नई देह

    औरत नहीं जानती है

    अपनी क्षमता

    पुरुष का विषाद, थकान, खालीपन और भी बहुत कुछ

    सोख लेती है वह बढ़िया सोख़्ते की तरह

    औरत को पता नहीं अपनी सुंदरता की ताक़त

    रंगोली के रंगों से घर ही नहीं सजाती

    सजा देती है वह और भी बहुत कुछ

    औरत को पता नहीं है

    कितना ज़्यादह कहती है उसकी चुप्पी

    आख़िर, संसार की सबसे अच्छी कविता है

    औरत।

    स्रोत :
    • पुस्तक : साज़ चुप है (पृष्ठ 14)
    • रचनाकार : रामकृष्ण प्रकाशन
    • प्रकाशन : रश्मि रमानी
    • संस्करण : 1997

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