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औनाइत कविताक मोन

aunait kavitak mon

आनन्द मोहन झा

आनन्द मोहन झा

औनाइत कविताक मोन

आनन्द मोहन झा

और अधिकआनन्द मोहन झा

    मारिते रास आखर भरल छैक

    शब्दकोशमे

    हजारक हजार, लाखक लाख

    अरबो खरबो भ' सकैछ

    मुदा हम सभ

    अपना हिसाबे, अपना सुविधानुसारे

    बीछि लेने छी किछु आखर

    अंगेजल, अखियासल अछि

    किछु आखर सभ

    अपन विचार, अपन बतकही

    अपन सर्जनाक लेल

    पेड़ैत रहैत छी

    ओहि चुनल आखर सभकेँ

    निर्भर रहैत छी

    ओतबे आखरपर

    बना देने छियैक आखरकेँ

    जमीन-जजात किंबा धन-सम्पति सन

    मलिकाना हक बुझि लेने छी

    निर्धारित क' देने छियैक

    ओकर सीमा, परिधि वितानकेँ

    मोसकिल तखन होइत अछि

    जखन बान्हि दैत छी

    कविताकेँ

    अपन ओहि सीमित शब्दकोषमे

    औनाइत रहैत छैक कविताक मोन

    सीमित आखरक खाँचमे

    हम क' दैत छियैक

    कविताक वितानकेँ संकुचित

    मूनि लैत छी

    अपन कान, अपन आँखि

    नहि सुनय चाहैत छी

    कविताक व्यथा

    नहि देखय चाहैत छी

    ओकर छटपटी

    बेढ़ि देने छियैक कविताकेँ

    अपन पसीनक आखरक

    किछु करचीसँ

    जखन की

    भरल पड़ल छैक

    शब्दकोश

    मारिते रास आखरसँ...!

    स्रोत :
    • पुस्तक : ई नहि थिक हमर प्रार्थना (पृष्ठ 87)
    • रचनाकार : आनन्द मोहन झा
    • प्रकाशन : नवारम्भ, मधुबनी/पटना
    • संस्करण : 2020

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