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अस्सीमवर्षपूर्तिपर मधुपजीक अभिनन्दन

assimvarshpurtipar madhupjik abhinandan

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

अस्सीमवर्षपूर्तिपर मधुपजीक अभिनन्दन

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    सुनि जनिकर झंकार सुमन शतदल विकसित भय गेल

    अणु अणुमे जागल रस सातो स्वर स्वरूप लय लेल

    मुसकाइत किरणक आलोकेँ मधुवन पैसि प्रवीण

    माँ मिथिलाक भरल घर आङन मधुरस बाँटि नवीन।

    जे मधुकोष फोलि निज राखल चाखथु विद्वद्वृन्द

    मैथिलीक आङनमे जनु अवतरला नव गोविन्द।

    जे राधाकृष्णक गुणगाने भावकोष निज फोलल

    राधाविरह करुण गाथा सुनि ककर मनुआँ डोलल

    जे करुणाक जलधिहुक तल धरि पैसि स्वाद चखने छथि

    मैथिलीक परिसरकेँ अनुखन अनुगुंजित रखने छथि।

    राधाकृष्णक भक्त, भक्तमे राधाकृष्ण बहेड़

    ताही मधुपक स्वरसँ मुखरित तिरवेनीक कछेड़

    ब्रजकिशोर गुण गाबथि, अनुगत ब्रजकिशोर मणिपद्म

    निरहंकार हृदयकेँ स्पर्शो कय सकल छल-छद्म

    कविशेखर आचार्य, आर्य बुझि शेखर कवि अनुगामी

    तारा तारा रटथि, तदपि नित तारा देथि प्रणामी

    चन्द्रकान्त मणि सदृश चरण नखमे जनिकर मन लागय

    ताही मधुपक ताण्डव सुन-सुनि सूतलि मिथिला जागय।

    निकर काव्य-सुधा रस पिबि-पिबि मर्त्यो अमर कहाबथि

    श्रीरमेन्द्र, श्रीमन्त, इन्दु, दीपक मधु-धार बहाबथि,

    हरि मोहन-मन हरिमोहनकेँ जे भरि मोन कनाओल

    भेल सहर्ष सहर्षा किसुनक लखि मंच बनाओल

    परमानन्दक प्राप्ति हेतु जत परमानन्दे लीन

    ताही मधुपक समधी बंगालहुसँ फूकथि बीन।

    उद्यत विश्वनाथ नचबालै जनकर सुनि झंकार

    मायानन्द विभोर, राघवाचार्य भरथि हुंकार

    नाथ तन्त्र, ईशो सचेत पढ़ि अनुपम पद विन्यास

    शत-सहस्र पद लोक-कंठमे पहुँचल बिनु आयास,

    सप्तशती दृष्टान्त भरल रचि जे निज परिचय देल

    अलंकार ताही मधुपक बल स्वयं अलंकृत भेल।

    एकादशी बिना रहनहु करबा लै नित उपवास

    जे अछि, बाध्य, तकर दुख लखि-लखि, भरि-भरि दीर्घ निसास

    लिखि द्वादशी करुणरस धारामे समाजकेँ बोरल

    रचि ताण्डव नवयुवकक धमनीमे उत्साहो घोरल

    जनिके गुंजनसँ अनुगुंजित मिथिला भरिक निकुंज

    प्रेरित करिते रहत हृदयकेँ तनिक प्रेरणा पुंज।

    कोटि-कोटि कमरथुआ कण्ठेँ पसरल सबतरि गीत।

    बाबाधामक दुर्गमपथपर गीते जनिकर मीत

    भोरक चलल बटोही साँझे बिसरि जाथि सब थाकि

    जखन छाक भरि कान हुनक मधुपक मधु-पद-रस छाकनि

    सतत शारदा जिह्वेपर नहि करय पड़नि आवाहन

    तनिक साहित्योदधिमे कयलनि भीमनाथ अवगाहन

    शतशत आशिष देल मुदित मन जनिका सीताराम

    हरिश्चन्द्र, श्रीकृष्णनन्दनो बिसरि जाथि धन-धाम

    मित्रम् बनि गोपाल, जनिक लग रामदेव सुख पाबथि

    जनिक रचित पद ललनागण मेलो ठेलामे गाबथि

    मैथिलीक उद्यान मध्य जनिके गुनगुन गुंजार

    ताही मधुपक स्वरमे कोकिल-कल कूजित सहकार।

    शरदक राका निशि नभमे चकमक चमकथि चान

    जगमन कय छिड़िआय इजोरिया बाँटथि मधुर-मखान,

    मैथिलीक आँगनमे असली पूर्णिमाक छवि छलकल

    काशीकान्त सदृश सुत तकरे द्युतिलै भूपर उतरल।

    कान्त युक्त तारा, मणि, देवो तीनू तनय सपूत

    जीवन-रस-संचालन पटु सुत तीनू सुचतूर सूत।

    कीर्तिवल्लरी लतरल चतरल कयलनि अस्सी पार

    चन्द्रमुखी अर्द्धांगिनीक बल भरल पुरल परिवार

    जगदम्बा-पद-पूजन-अर्चन, भोलानाथक ध्यान

    चिन्तन एक चित्तमे अनुखन-हो जगतक कल्याण।

    कविचूड़ामणि चरणकमलमे अमर कविक अभिनन्दन

    कविता कामिनीक मस्तकपर ‘मधुप’ रहथु बनि चन्दन।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 288)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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