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अप्रैल 1814—के पद

april 1814—ke pad

अनुवाद : यतेन्द्र कुमार

पर्सी बिश शेली

पर्सी बिश शेली

अप्रैल 1814—के पद

पर्सी बिश शेली

और अधिकपर्सी बिश शेली

    (1)

    दूर रहो! शशधर के नीचे काला है अवनीतल,

    स्वरित मेघ पी गए साँझ की अंतिम पीत किरन को!

    दूर रहो! टेरेंगे तम को, शीघ्र वायु के संकुल!

    घन-निशीथ कफनाएगा ही अब नभ-द्युति पावन को!

    रुको नहीं, अब समय गया, हो दूर! कह रही, हर ध्वनि,

    असत-बंधु-भावना अंतिम आँसू-कण से उकसा!

    शीत-दीस प्रिय-दृग रुकने का करता नहीं समर्थन।

    दिखलाते, कर्तव्य, भूल, तुमको फिर पथ निर्जन का!

    (2)

    दूर! दूर! अपने उदास, ख़ामोश, उसी घर को चल,

    और तिक्ततर अश्रु बहा इसके उजड़े अनाथ पर।

    प्रेतों सी आतीं-जातीं, निहार छायाएँ धूमिल,

    जातीं करुण-हास के जो अजनबी जाल उलझा कर!

    तैरेंगे तब शीश चतुर्दिक शिशिर-वन्य पल्लव, मृत,

    चमकेंगी तब चरण तले वासंतिक कलियाँ ओसिल!

    मृत को ढकते कुहरे से जग, या आत्मा, होगी क्षत,

    पूर्व, अर्द्धनिशि-भ्रू, उषास्मिति, तुम औ’ शांति, सकें मिल!

    (3)

    है विश्रांति निशीथ मेघ-छाँहों के पास स्वयं की,

    क्योंकि श्रांत पवमान मौन, शशि गहराई में खोया!

    पाता है आराम तनिक अब चिर अशांत अर्णव भी,

    जो भी करता कंपन, श्रम, दुख, नियत नींद में सोया!

    तुझे क़ब्र में शयन मिलेगा, करें प्रेत पलायन,

    किया तुझे प्रिय जिन्हें कि उस गृह, कुंज और उपवन ने!

    मुक्त तेरी याद, पश्चाताप, तेरे गायन,

    दो स्वर के संगीत, एक मधुमय स्मिति की ही द्युति से

    स्रोत :
    • पुस्तक : शेली (पृष्ठ 31)
    • संपादक : यतेन्द्र कुमार
    • रचनाकार : पर्सी बिश शेली
    • प्रकाशन : भारत प्रकाशन मंदिर, अलीगढ़

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