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अपलक प्रतीक्षा

aplak prtiksha

पल्लवी जयराम

पल्लवी जयराम

अपलक प्रतीक्षा

पल्लवी जयराम

और अधिकपल्लवी जयराम

    तुम्हें तो फिर भी आना चाहिए

    नदी को पूरी तरह

    कोई भी बाँध

    रोक ही नहीं सकता है।

    भला बरसात

    किसी के रोके रूकती है?

    हजारों रास्ते होते हैं

    प्रकाश के आने के लिए

    भाव भी अपने साथ

    स्वयं भंगिमा लाते हैं।

    फिर तुमको झिझक कैसी

    जबकि पता है, तुम बच्चे की

    बहु प्रतीक्षित रेलगाड़ी हो।

    कितनी दस्तकें होती हैं

    मेरे दरवाज़े पर

    फोन भी कई बार बजता है

    देखती हूँ, बात करती हूँ

    लौट आती हूँ

    वापस।

    सोचती हूँ—

    छापेखाने में

    कितनी किताबें छपती होंगी

    कितनी किताबें लिखी जाती हैं

    मेरी दुनिया भी

    पूरी सृजनात्मक है

    लेकिन अभिव्यक्ति रुकी है

    तुम्हारी प्रतीक्षा में।

    आओ दक्ष के यहाँ

    शिव की तरह

    नदी, कविता, किताब

    या किसी बच्चे की कल्पना बनकर

    सब नियमों को ध्वस्त करते हुए

    सृजन की नई परिभाषा लिखो

    तुम्हारे आने की

    अपलक प्रतीक्षा है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : पल्लवी जयराम
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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