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अनूठी फुलझड़ियों का ख़रीददार

anuthi phulajhaDiyon ka khariddar

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

ल्यूबो बीजनैर

ल्यूबो बीजनैर

अनूठी फुलझड़ियों का ख़रीददार

ल्यूबो बीजनैर

और अधिकल्यूबो बीजनैर

    रात्रि के मोड़ पर अँधेरे में पहुँचा,

    रुका और क्रिसमस-गोलों की दुकान में पहुँचा।

    उधर फेरीवाला सुडौल गुड़ियों के बीच खड़ा

    सुनहरे, रूपहरे धागे लगा रहा, सजा रहा।

    फुलझड़ियाँ सबसे अच्छी रहेंगी सोचा

    कौंध गया अर्धस्पष्ट कोई सपना :

    विचारों में सहस्र दीपक गुज़र गए,

    अंतर्चेतना में आए और धप् से बुझ गए।

    सुनिए, मेरी जन्मी है बेटी...

    नन्हीं-सी सच्ची बेटी...

    भेज तो सकता उसे स्पेन या एशिया

    दीजिए मुझे ये फुलझड़ियाँ,

    कि नन्हीं की कल्पना बढ़े...

    रंगबिरंगी मायाविनों की आँखें देख रहीं

    आदमी को जो यों टूटे डग भर रहा।

    (दीखता है हम-सा ही, हमारे साथ क्यों नहीं?

    ख़ूब आनंद से सोता हमारी डिब्बियों में!)।

    “भगवन्” —बोला—“आज तो बहतर है,

    किसी वास्तविक, बड़े दुर्भाग्य से तो,

    यदि नहाया भी आँसुओं की बाढ़ में,

    मन चाहता है कहीं दूर, दूर,

    कहीं दूर कोई द्वीप नीला...

    अप्रिय मौन। दुकान फिर गई।

    प्रकाश की लहर बाढ़-सी अँधेरे मे बह गई।

    चेहरे विलीन हुए। प्रत्येक ज्यों अपने अँधेरे में चला

    वह आदमी भी अपने टूटे डगों से चला।

    उसके पीछे चली सहस्रों दीपिकाएँ,

    चिंगारी, तारे, दीए, फुलझड़ियाँ,

    धुँधले कोटर पेरिस के, लंदन के

    ब्रींदिसी, नेपल्स, मारसेल्स और नीस

    और रंगबिरंगे गुब्बारों की मालाएँ

    कच्छों का, हसरतों का अजूबा, सॉनेट का सपना—

    या कहीं वह तो नहीं, दीपिकाओं की आभा में—

    साम्राज्ञी! वेनिस स्वर्गीय!

    (अपने बजरे की पतवार पर

    डोलती, चमकती, काँपती विचित्र शक्ति से

    मानो अज्ञात मंडलों की कोई आत्मा,

    या रात की गर्दन पर पड़ी माला!)

    बजरे! कितनी बार तू यों

    बह गया सांध्य न्यूयार्कों के भास में

    ओह, मन चला गया कितनी बार यों

    प्लेस ला कांकार्द की दहकती नदी में!

    अंततः कहीं अपने प्रदेश में

    मिल गई बाँह नित्य के पथिक की।

    भारी मुट्ठी से उसने उसे दीवार पर चिपका दिया—

    कमबख़्त!

    और उसके उन रूपहरी चित्रों का गट्ठा कुचल दिया :-

    वे फिर एक बार चमक उठे

    प्रकाशमान धारा में

    और फिर चले गए

    मायावी धारा में।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 24)
    • रचनाकार : ल्यूबो बीजनैर
    • प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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