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अंतिम इच्छाएँ

antim ichhayen

अमित उपमन्यु

अमित उपमन्यु

अंतिम इच्छाएँ

अमित उपमन्यु

और अधिकअमित उपमन्यु

    वर्तमान एक दोमुँहा साँप है

    जिसका एक मुँह अतीत की ओर है

    दूसरा भविष्य की

    हमारा अस्तित्व लगातार व्यस्त है

    गुज़रते पल की तड़फड़ाती पूँछ की परछाई को मुट्ठी में जकड़ने में

    हाथ में छूटी आत्मकथाओं के पन्ने

    तूफ़ानी भँवर में समा सारी दिशाओं में फैल जाती हैं,

    मैं निहारता रहता हूँ अपनी परछाई को वर्तमान में खड़ा

    अतीत में उदित, भविष्य में अस्त होते हुए

    बचपन के अध्याय

    जवान खेतों की पीठ पर लदे

    मौसमी गीत गुनगुना रहे हैं

    काग़ज़ की नावों और हवाई जहाज़ों पर वसीयत लिख

    उन्हें भेज दिया जाता है ख़ज़ाना और प्रतिक्रियाएँ कमाने के लिए

    जवानी के मोटे-मोटे अध्याय बिखरे पड़े हैं

    सुनसान सड़कों, अँधेरी गलियों, बंजर खेतों और उजाड़ बग़ीचों में

    दिन के उजालों के आरामतलब कुत्ते

    सुनसान रातों में राजप्रहरी नियुक्त कर दिए जाते हैं

    हर रात ठीक दो बजे मेरी परछाइयाँ

    नंगे शहर की पीठ पर गुमसुम टहलती हैं

    तभी सारे कुत्ते कंधे की सबसे ऊँची हड्डियों पर चढ़

    आश्वासन भरे अशुभ गीत गाने लगते हैं

    बुढ़ापे के कोरे अध्याय के

    आख़िरी पन्ने के आख़िर में

    लिखा है “धिक्कार!”

    ये आत्मा का ख़ालीपन है

    जो हमेशा प्रस्तावना में अटकी रही

    ज़िंदगी में उपसंहार नहीं होता

    उसके हर एक शब्द का न्यायसंगत बँटवारा

    सारे पन्नों के बीच कर दिया जाता है

    ऐतिहासिक परंपराओं द्वारा

    जीवन भर दमित अरमानों से

    फाँसी के तख़्त पर

    पूछी जाती है अंतिम इच्छा

    और दिए जाते हैं चार विकल्प चुनाव के लिए

    स्वीकृत बजट के अनुसार

    अंतिम इच्छा पूछने के उपक्रम में

    जल्लादों की सद्भावना की मवाद

    अरमानों के फेफड़ों में ठसाठस भर दी जाती है

    मोटी सुई वाले इंजेक्शन से

    और एक नए सहृदय विचार के काले लिफ़ाफ़े से मुँह ढाँप

    उनका गला घोंट दिया जाता है

    “दुनिया कितनी ख़ूबसूरत है!”

    दु:ख महकते हैं रातों में रातरानी की तरह

    भूखी आत्मा के बुख़ार से तपते बदन की आँच में,

    अलाव की तरह दमकते हैं सर्दियों की कुहरे भरी शामों,

    और खाँसते जाते हैं खों-खों, जलती लकड़ियों से उड़ती कालिख़ पर

    उनके फेफड़ों से सेब का रस और महँगी शराबें रिसने लगती हैं बरसातों में

    पहले उनके ‘जेनेटिकली मोडिफाइड’ बीज फेंक दिए जाते हैं उर्वर

    ज़मीन पर सैलाब उगाने के लिए

    और फिर ज़मीनों को बंजर किया जाता है उनकी लहलहाती फ़सल के लिए;

    अंत में छिड़क दिए जाते हैं महँगे आयातित कीटनाशक

    दु:ख के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने के लिए

    सूरज उगता है और डूब जाता है रोज़

    भोर और रात का चल रहा है अब भी चिरकालीन युद्ध

    कैसे लिख दूँ मैं अब अंत में दो उम्मीदज़दाँ क्रांतिकारी शब्द

    एक वैश्विक काग़ज़ी तसल्ली से लिथड़े हुए?

    जीवन से बड़ा आसान है छलछंदों में योद्धा बनना

    ऐसे वक़्तों की फ़सलें उगनी होती हैं

    हर छाती में अलग-अलग

    अपने-अपने शब्द

    अपना-अपना वक़्त

    अपनी-अपनी अंतिम इच्छाएँ

    स्रोत :
    • पुस्तक : रेत पथ (अंक 3-5) (पृष्ठ 47)
    • रचनाकार : अमित उपमन्यु
    • संस्करण : जुलाई 2014-दिसंबर 2015

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