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अन्तर्नाद

antarnad

की गाउ, गाबि ककरा सुनाउ?

गुण अछि ठामहि, गुण-गाहक नहि,

रीझत के, हम ककरा रिझाउ?

सुनि गीत करए ज़ग—‘वाह-वाह'!

पाबए के भावक अगम थाह?

भए जाइछ व्यर्थ करुणा, प्रवाह,

महिसिक आगाँ मे अपन, हाए!

की मधुर स्वरेँ वीणा बजाउ?

की गाउ, गाबि ककरा सुनाउ?

हम दैत अपन छी हृदय खोलि,

जड़ प्रकृति निरखतहिँ उठए डोलि,

छन मे लै छी जन-मन टटोलि,

तखनहुँ सजीव निर्जीव बनल

रहि जाइछ, बाबि मुँह, बनल हाउ!

की गाउ, गाबि ककरा सुनाउ?

केओ नहि दरदी, सब वक्त्रवीर,

हो लघुक अगति लखि के अधीर?

सूत्रधार, ने कुटिल-कीर।

नहि नयन-जलक किछुओ महत्त्व,

हम ककरा लग संतोष पाउ?

की गाउ, गाबि ककरा सुनाउ?

परमार्थ, स्वार्थ मे परम भेद,

करनी किछु, कथनी मात्र वेद!

मानव दानव भए रहल खेद,

पापी मन बदलए श्रुतिक पाठ

सुनने नहि, उर कह, पति बचाउ।

की गाउ, गाबि ककरा सुनाउ?

तैओ हम गाबी प्रलय-गान

सुनि काँपए भूधर, आसमान,

भए उठथि सजग शङ्कर महान,

वाणीक लाज थिक हमर लाज,

जागू, लघु! स्वर मे स्वर मिलाउ!

की गाउ, गाबि ककरा सुनाउ?

स्रोत :
  • पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 65)
  • संपादक : अजीत मिश्र
  • रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2024

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