एक धरती मायकेर सन्तान
थीक मानव सब सहोदर भाय।
बसौ कोनो ठाम
स्वर्गमे, कैलासमे
गोलोकमे, पातालमे
अमरिकामे, अफ्रिकामे
यूरोपमे वा एसियामे।
कहाबौ क्यो एस्किमो
गन्धर्व किन्नर देवता
नाग, निग्रो असुर, मानव
किंबा आर्य, अनार्य
विप्र श्रोत्रिय, वैश्य, क्षत्रिय
केवट, अमात, गोआर
डोम, दुसाध, चमार
कोल, भिल, सौतार
ताहिसँ की?
भूमि, रौद, बसात, पानिक
कारणेँ उत्पन्न
होइत अछि लाल पीयर
गोर, कारी, श्याम चामक रंग।
व्यवसाय कौलिक बनय काले जाति
एहिसँ की ऊँच नीचक भेद-भाव-विचार?
केवल काज थीक प्रधान
नीच थीक डकैत, चोर, ओ बैमान
जे करै अछि परक तोषामोद
परक शोषण, वा बजै अछि फूसि
जे करै अछि आनकेर अपकार
से नीच निश्चय थीक।
पोसाक सम थिक धर्म
ऐ मे छै न किछुओ मर्म
बौद्ध, ज्यू, क्रिस्तान
हिन्दू, सनतान आर्य ओ इसलाम
सभ थीक एक समान।
मानवकेर अन्दर मेद
जै उत्पन्न करइछ त्याज्य थिक से वेद
धर्मशास्त्र, पुराण, बाइबिल ओ कुरान।
जे कहै अछि थीक बेलक गाछ शिवक निवास
भगवती तुलसी थिकी, ब्रह्मा थिका पलास
बड़, पीपर, कदम, पाकड़ि, आागि, धार, पहाड़
पाषाण दिनकर चान, सभटा थिक देवता।
बीछ मूस, नकार, साप, श्वान, सियार
बड़द, गदहा, भैंस
देवताकेर वाहन थीक मान्य
आ सभसँ तुच्छ सभक पूजक मात्र मानव थीक।
थीक से फुसिआह
जे कहै अछि ईश्वरक अवतार अवनीनाह।
जे रचै अछि राति दिन पाखंड भाग्यक जाल
पूर्व जन्मक कर्मफल कहि
झाँपैछ धनिकक पाप
तोपैछ लोकक आँखि
जाहिसँ नर धनक हेतुक पूजैत अछि पाषाण
दैछ दण्ड प्रणाम।
सुत निमित्त लै अछि कुशोथरि, अछि हरिवंश
जाइत अछि भगताक गह्वर करबैक हेतु गोहारि।
बाढ़ि रोकक हेतुएँ कौशिकीकेँ दैछ पाठी
रौदिक समय डुबबैछ शम्भुक लिंग
रोगमे संयम दवा तजि चानकेँ कबुलैछ छाँछी।
मनुष्ये ऐ विश्वमे अछि सभसँ बुधियार ओ बलवान
जे एकर दुर्जेय बौद्धिक शक्तिकेँ कय नष्ट
बनबैत अछि जड़ वस्तुक दास
ओकर आत्माकेँ बनाबय तुच्छ, दुर्बल, हीन
स्वाभिमानविहीन थीक से बैमान
एहि मानव सत्य युगमे
भेटतै न ओकरा स्थान।
- पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 53)
- संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
- रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
- प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
- संस्करण : 1989
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