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अनोखी यात्रा

anokhi yatra

गरिमा सिंह

गरिमा सिंह

अनोखी यात्रा

गरिमा सिंह

और अधिकगरिमा सिंह

    काग़ज़ पर इश्क के स्याह रंग में

    ढूँढती हूँ दर्द भरी तन्हाई

    अचानक एक हाथ बढ़ता है मेरी तरफ़

    और आँखों में स्मृतियों के

    चेहरे उभरने लगते हैं

    एक आँख मुझे देखती है

    और मुस्कुराती हुई

    धरती पर मेरा चेहरा बना देती है

    अचानक वह वाष्पित होकर बादल बन जाता है

    और बरसता है मेरे चेहरे पर

    स्मृतियाँ धूँधलाने के बजाए

    और गाढ़ी हो जाती हैं

    और मेरी ज़मीन पर दो अक्श जीवित हो उठते हैं

    एक—मेरा

    और दूसरा—तुम्हारा

    हम एक-दूसरे का हाथ थामे,

    मुस्कुराते हुए चलते हैं

    अपनी-अपनी दुनिया को संभाले

    ना जाने कौन-सी अनोखी यात्रा पर…

    बिना मंजिल पर पहुँचने के किसी वादे के साथ

    रोशनी और अँधेरे को एक साथ महसूस करते हुए

    कोई पगडंडी तक नहीं, ना ही किसी का अनुसरण

    सब कच्चा है, केवल दर्द का चौड़ा रास्ता है…

    हमने चुना है उसे, क्योंकि यह हमारी पीड़ा से बना है

    एकदम मज़बूत, कठोर और सरस

    मानो यह नदी की समुद्र तक की अनथक यात्रा हो

    ऐसी यात्राएँ कितनी सुंदर होती हैं

    जहाँ स्याह शब्दों के साथ

    स्मृतियों से बाहर झाँकते हुए तुम

    फिर-फिर मिलते हो साथी!

    स्रोत :
    • रचनाकार : गरिमा सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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