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अहा सन अहीं छी

aha san ahin chhi

आरसी प्रसाद सिंह

आरसी प्रसाद सिंह

अहा सन अहीं छी

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    अहाँकेँ कहू की? अहाँ सन अहीं छी।

    कहाँ छी अहाँ, हम जहाँ के तहीं छी।

    लजा कऽ कमल पानिमे डूबि गेलै

    मिलाबऽ कोनो आँखि उपमा अयलै।

    हमर मन-हरण, प्राण मोहन अहीं छी।

    अहाँकेँ कहू की? अहाँ सन अहीं छी।

    हिमालय कही, तँ निरानन्द पाथर।

    कही सिन्धु जँ, तँ सलिल खार ओकर।

    लगा साथ ली माथ, चानन अहीं छी।

    अहाँकेँ कहू की? अहाँ सन अहीं छी।

    मुदा चाननो तँ रहित फुल-फलसँ।

    ने चानोक आनन-कला मुक्त मलसँ।

    दिवाकर-किरण-रक्तमादन अहीं छी।

    अहाँकेँ कहू की? अहाँ सन अहीं छी।

    मुदा, सूर्य किरणो प्रखर ताप-कारी।

    अहाँकेँ भावना-भाव-लोचन-विहारी।

    हमर कल्पना-कल्प-कानन अहीं छी।

    अहाँकेँ कहू की? अहाँ सन अहीं छी।

    मुदा काननोमे भरल काँट-कुश छै।

    एहन के, सकल लोक जेकरासँ खुश छै।

    अकिंचन हृदय केर कंचन अहीं छी।

    अहाँकेँ कहू की? अहाँ सन अहीं छी

    मुदा, कंचनोमे भरल दोष ढेरी।

    अहाँ देवता, हम अहाँ केर पुजेरी।

    अहीं छी हमर साँस, जीवन अहीं छी।

    अहाँकेँ कहू की? अहाँ सन अहीं छी।

    अहींकेँ सतति आरती हम उतारब।

    अहींमे अपन रूप सदिखन निहारब।

    धरब हम अहींक संग, दर्पण अहीं छी।

    अहाँकेँ कहू की? अहाँ सन अहीं छी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 94)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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