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अधजली रोटी

adhajli roti

संतोष सिंह

संतोष सिंह

अधजली रोटी

संतोष सिंह

और अधिकसंतोष सिंह

    रात के अंधेरे में जो झोपड़ियाँ जलाई गईं

    साज़िश की रत्ती भर भी सबूत नहीं मिला था

    बस गीली मिट्टी पर पाँव के कुछ निशान थे

    पर प्रशासन के लिए इतना क़ाफ़ी नहीं था

    टूटी झोपड़ी के आगे कुछ अधजली रोटियाँ भी थीं

    एल्यूमिनियम की चौड़ी वाली थाली में

    मिट्टी के चूल्हे के पास

    जिसे उसने सेका था बड़े जतन से पिछली रात

    चूल्हे की आग और पेट की आग मिलाकर

    पर घर जो जला तो रोटी कौन खाता

    सुबह की ओस से रोटी अकड़ गई थी

    उसकी सिलवटें दादी की झुर्रियों जैसी थीं

    दादी बस रोटी ही देखे जा रही थी

    उसकी भूख कब की मर गई थी

    उधर सरकारी चूड़ा और गुड़ बाँटा जा रहा था

    पर दादी अब भी अपनी मृत रोटी के साथ थी

    आख़िर रोटी का भी एक घर जला था

    उधर चूल्हा उदास बैठा था

    आख़िर, चूल्हे का सबसे बड़ा दर्द है

    उसकी राख़ का ठँडा होना।

    स्रोत :
    • रचनाकार : संतोष सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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