कतऽ छलहु आ आइ कतऽ छी, रहि-रहि मनमे प्रश्न उठैछ,
औँड़ि मारि, मन रहि जाइत अछि, उत्तर एकर न ताकि पबैछ।
जे जग भरिकेँ बाट देखौलक, अपने आइ गेल भुतिआय,
ज्ञानक दीप अखण्ड जरै छल, कोन बसातेँ गेल मिझाय।
भाषा-भूषा विविध, विविध मत-पंथ तथा भोजन परिधान,
रहितहुँ, अन्तर्निहित एक धारा सबमे अछि एक समान।
करुणा, ममता, दया, त्याग-बल बढ़ल मातृ-भूमिक उत्कर्ष,
किन्तु आइ कहि त्राहि-त्राहि अछि कुहरि रहल ई भारतवर्ष।
लागल कोन अन्हरजाली जे, सूझि रहल नहि उबरक बाट,
खयलक कोन घून, जे देशक पौरुष आइ पकड़लक खाट।
दुर्बुद्धिक मारल मति, लागय अनचिन्हार अपनो इतिहास,
अपनहि मुँहसँ अपने रत्नक कऽ रहलहुँ हम सब उपहास।
किए मनुक्ख मनुक्ख रहल नहि, राक्षससँ बत्तर बनि गेल,
तेहन-तेहन दुष्कर्म करय जे नरकहुमे जा ठेलम ठेल।
डेग-डेगपर मृत्युक नर्त्तन, घर-घरमे पैसल आतङ्क,
यदि पौरुष नहि जागत, लागत निश्चय देशक माथ कलङ्क।
छिटकि रहल आशाक किरण जे बलिदानीक पंक्ति अछि ठाढ़,
करत समर्पित शीश देश-हित संकट भने प्रचण्ड प्रगाढ़।
पुनः 'मातरम् वन्दे' ध्वनिसँ दिग्दिगन्त अनुगुंजित आइ,
करय अङैठीमोड़ देश, से देखि बढ़य विश्वास सवाइ।
बढ़ल आसुरी-वृत्ति चतुर्दिक, पापक भेल जाय विस्तार,
जा धरि धर्मक ग्लानि न होइछ ता प्रभु नहि लै छथि अवतार।
से शुभघड़ी निकट बुझि पड़इछ, असुर दलक अछि अन्त समीप,
पसरत शुभ आलोक लोकमे, ससरत तिमिर, बरत पुनि दीप।
- पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 369)
- संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
- रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 2025
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.