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अभिलाषा

abhilasha

बिभा विमर्श

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अभिलाषा

बिभा विमर्श

और अधिकबिभा विमर्श

    जखन करेजपर चलैत अछि शब्दक बाण

    टुकड़ी-टुकड़ी भऽ जाइत अछि हमर काया

    निष्प्राण भऽ जाइत छी हम

    चिचिआय लगैत अछि हमर संवेदना

    से मात्र सुनिये टा सकैत छी हम

    कियैक हमर संवेदनाक बेकलता

    नहि पहुँचैत अछि ओतय धरि

    कियैक हम भऽ जाइत छी अथबल सनक

    हम्मर गवाही टा रहि जाइत अछि

    आँखिसँ बहैत नोर भीजल आँचर

    किछु प्राप्त करबाक अभिलाषा

    झिकझोरैत रहैत अछि सदिखन

    आगाँ बढ़बाक क्रममे

    दिनहुँमे भऽ जाइत अछि निशाभाग अन्हार

    ओझराकऽ खसैत छी हम

    दुआरिपर टाँगल पिजरामे बन्द अछि

    एकटा सुग्गा

    राखल छैक ओकरा आगाँ सुन्नर पाकल फल

    भेटियो जाइत छैक ओकरा बहुतरास दुलार

    जाइत अबैत लोक देखैत छैक ओकरा

    सीखबैत छैक ओकरा

    किओ सीताराम, किओ राधेश्याम

    हम जखन जाइत छी पिजराक आगाँ

    तखन बूझि पबैत छी सुग्गा मनक भाव

    जेना हमरा कहैत होअय सुग्गा

    खोलि दे हमरा, उड़ब हम घुमब आकाशमे

    गाछक डारिपर बैसिकऽ खायब डम्हरस फल

    आनंदसँ झूलब झूला

    मुदा पिजरापर बन्द ताला खुजत कोना

    सुग्गा उड़त कोना

    लगैत अछि सुग्गाक जीवन जेना हुए अपन जीवन

    जीवनमे ओझरायल हमहूँ सभ

    सुग्गे तँ छी एकटा

    स्थिति देखैत कखनो सीताराम, कखनो राधेश्याम

    सुग्गा मोनक भाव वएह प्रश्न

    जीवनक ताला खुजत कोना

    सभ बन्हन काटि अपन मोनसँ उड़ब कोना?

    स्रोत :
    • पुस्तक : नहि सीता नहि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 44)
    • रचनाकार : बिभा विमर्श
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2023

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