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अभी न होगा मेरा अंत

abhi na hoga mera ant

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

अभी न होगा मेरा अंत

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

और अधिकसूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

    अभी न होगा मेरा अंत।

    अभी-अभी ही तो आया है

    मेरे वन में मृदुल वसंत—

    अभी न होगा मेरा अंत

    हरे-हरे ये पात,

    डालियाँ, कलियाँ कोमल गात।

    मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर

    फेरूँगा निद्रित कलियों पर

    जगा एक प्रत्यूष मनोहर

    पुष्प-पुष्प से तंद्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,

    अपने नव-जीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,

    द्वार दिखा दूँगा फिर उनको

    हैं मेरे वे जहाँ अनंत—

    अभी न होगा मेरा अंत।

    मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,

    इसमें कहाँ मृत्यु?

    है जीवन ही जीवन

    अभी पड़ा है आगे सारा यौवन;

    स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे यह बालक-मन;

    मेरे ही अविकसित राग से

    विकसित होगा बंधु, दिगंत—

    अभी न होगा मेरा अंत।

    स्रोत :
    • पुस्तक : राग-विराग
    • संपादक : रामविलास शर्मा
    • रचनाकार : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
    • प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन
    • संस्करण : 2006

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