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आपन गाँव भेंटाते नइखे

aapan gaanv bhentate naikhe

कृष्णानन्द कृष्ण

कृष्णानन्द कृष्ण

आपन गाँव भेंटाते नइखे

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    कजरी, सोहर गीत भुलाइल कहँवाँ जाता

    जइसे जिनिगी में कवनो उल्लासे नइखे

    थाकल मन के इचिको मिलत सवाँसे नइखे

    भार भइल जिनिगी कहँवाँ, अब तनिक सोहाता।

    लय जिनिगी से भागल, कहँवाँ अब पकड़ाता

    छितराइल सुर सातो, गीत गवाते नइखे

    भीड़-भाड़ में आपन गाँव भेंटाते नइखे

    झूमत रहे फसल जहँवा अब कास फुलाता।

    हर चेहरा अजनबी हो गइल, देख लोगे

    कइसन कठिन समय आइल बा आपन-आपन

    लोग बजावत डफली देखीं। भागे-जोगे

    माथा बाँचल। भइल कचाइन, सभा-समापन

    परजा करे कमाई राजा बइठल भोगे

    बइठीं चुप मत। चल के भंग करीं अनुशासन।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 17)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2012

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