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आँचर के टुकड़ा

aanchar ke tukda

रमाकान्त मुकुल

रमाकान्त मुकुल

आँचर के टुकड़ा

रमाकान्त मुकुल

और अधिकरमाकान्त मुकुल

    अनगिनित बेर

    मन में

    उठेला सवाल

    कि बइठल-बइठल

    जरूरे सोचत होइहें भीष्म

    कि कइसे फँस गइले धर्मराज

    शकुनी के पास में

    घूम जाला

    एगो के बाद एगो चित्र

    ठहर जाला आँख

    जा के द्रौपदी के

    साड़ी का छोर पर

    जवना के

    पकड़ के खींचत रहे

    बेरहमी से

    दुशासन के हाथ

    बइठावे खातिर

    निर्वस्त्र द्रौपदी के

    दुर्योधन के जाँघ पर

    डूबल रहे

    पूरा के पूरा हस्तिनापुर

    स्वार्थ में

    दुहाई देत

    धर्म वचन के

    झुक गइल रहे

    पाण्डव दल के मूड़ी

    सिया गइल रहे

    सबकर ओठ

    सभे

    चुप्पी साध के

    सुनत भर रहे

    नंगा होत इतिहास के

    चीख पुकार

    अस्त भइल जात रहे

    सभ्यता के आखिरी किरिन

    तसहीं उठल

    एगो कटल अँगुरी

    जवना में

    लिपटल रहे

    आँचर के टुकड़ा

    बच गइल रहे

    भरत वंश के लाज

    स्रोत :
    • पुस्तक : आँचर के टुकड़ा (पृष्ठ 2)
    • रचनाकार : रमाकान्त मुकुल
    • प्रकाशन : भोजपुरी संस्थान, पटना
    • संस्करण : 2003

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