आज किसी ने पूछा मुझ से कौन हो तुम और क्या थी?
क्या बनना था तुमको पता है, और क्या तुम बन पाई?
हँसी जोर से आई मुझको, हँसी जोर से आई मुझको
संग आँखें भर आईं
सुन पाओगे कौन थी मैं और कहाँ कहाँ हो आई,
क्या पाया क्या खोया मैंने, आज बताने आई,
उडी गगन में बाँधे पंखों, नापी सागर की गहराई
न स्नेह मिला न प्रेम, मगर फिर भी जीवन जी आई
मैं कौन थी और क्या बन पाई...
मैं थी एक अनचाहा भ्रूण, एक अनचाहा नन्हा शिशु,
एक अनचाहा भूखा पेट,एक अनचाहा तन ढूँढ़ता कपड़े
एक अनचाहा ख़र्च किताबों का, एक अनचाहा मन स्नेह की चाहत करता
एक अनचाहा वृक्ष छाया फल देता, एक अनचाही बेल दीवारों के दागों को ढकती,
एक अनचाही गंध जो आँख नाक को छलती,एक अनचाही लौ जो जलके रोशन घर को करती
एक अनचाहा प्रेम जो घर बिस्तर को भरता, एक अनचाहा हाथ जो खेतों की रखवाली करता
एक बुझा एहसास जो एहसासों के सागर भरता
फिर एक जर्जर काया जो न काम किसी के आती,
फिर एक बंजर धरती जिस पे ओस न स्वाति आती,
फिर एक खाली बादल जो न बरसे न गरजाए,
फिर एक बुझती बिजली जो न चमके न कड़काए
एक बुझती-सी बाती जो न रोशन न बुझ पाए
एक अनचाही गंध जो घर आँगन बदबू भर जाए
एक बड़ा-सा पेड़ जो गिर के तन अपना दे जाए,
पूछूँगी मैं भी ईश्वर से, एक बार मिल जाए,
कहाँ-कहाँ की ठोकर देकर, यहाँ मुझे क्यों लाए,
प्रेम-स्नेह से वंचित रखा, अब मन क्यूँ तुम को गाए
कहीं हाय जो निकली मन से, धरा वहीं फट जाए
यम अब आ कर मुझको चाहे स्वर्ग-नर्क ले जाए
बस अब मुझसे होना बनना और न पूछा जाए...
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