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आधे चाँद की रात

aadhe chaand ki raat

अमित उपमन्यु

अमित उपमन्यु

आधे चाँद की रात

अमित उपमन्यु

और अधिकअमित उपमन्यु

    रात मुड़ती है भोर से एक आंगन पहले फिर से रात हो जाती है

    लौट आते हैं सारे भीड़ भरे ख़्वाब सन्नाटों से उठकर

    रो रही है एक भीड़ हँस रही है एक भीड़ सो रही है

    ख़्वाबों में सोना तो कुफ़्र है!

    फिर मुड़ती है रात एक बार कहीं शाम हो जाए

    और रात होने से पहले सो जाती है।

    तीन घर हैं तुम्हारे जहाँ मेरी कल्पनाएँ पहुँचती हैं

    तुम्हें ढूँढ़ते हुए तुम कहीं नहीं मिलतीं।

    तुम घर में नहीं रहती हो

    मेरी कल्पनाओं में नहीं रहती हो

    भूल गई हो कहीं रहना अपना होना भूल गई हो।

    आज आधे चाँद की रात है

    और तुम्हारी भारी साँसों की आवाज़ मुझ तक नहीं पहुँच रही है।

    मैं बाक़ी के उदास-अधूरे-अंधेरे चाँद पर बैठा इंतज़ार में हूँ

    कि तुम्हारी साँसों पर चलकर तुम तक पहुँचूँ।

    चाँद की कोई ग़लती नहीं कि वह साँस नहीं लेता,

    तो पी जाता है तुम्हारी सांसें और चुपचाप सिसकियाँ

    कुफ़्र तुम्हारा है जो ख़्वाबों में सो जाती हो अपने

    तीन घर और अनगिनत कल्पनाओं के बावजूद

    बस एक चाँद मिलता है तुम्हें साँस लेने के लिए।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अमित उपमन्यु
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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