मन उनकर कतना सहक
man unkar katna sahak
मन उनकर कतना सहक गइल बा
सब उनकर करनी महक गइल बा
हाल उनकर कहीं, त कहीं का, ना बुझा
चाल उनकर बहुते बहक गइल बा
लूट, हतेया, बलात्कार सगरो मचल
आग गजबे के देस में लहक गइल बा
रोजे-रोजे नया उतपात करेलन ऊ
देख जनता के छतिया दलक गइल बा
- पुस्तक : सुर न सधे (पृष्ठ 39)
- रचनाकार : नागेन्द्र प्रसाद सिंह
- प्रकाशन : लोग प्रकाशन, पटना
- संस्करण : 2000
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