मरि-मरिकऽ जे जीबय से आदमी चाही
mari marikऽ je jibay se adami chahi
मरि-मरिकऽ जे जीबय से आदमी चाही
राखय बिहाड़ि हाथमे से आदमी चाही।
अधिकार लेल निकलय बनिकऽ प्रचंड जे
लह-लह करैत साँप सन से आदमी चाही।
ढाहय जे भीत शोषणक गर्जन करैत घोर
बनिकऽ कराल काल सन से आदमी चाही।
लाबय जे लादि पीठपर समताक चानकेँ
नभसँ प्रबल राकेट सन से आदमी चाही।
हर्षक सुगंधि बाँटय वर-घरमे जे अनूप
अनूपम बसन्त ऋतुसन से आदमी चाही।
- पुस्तक : कान्ह पर लहास हमर [मैथिली गजल संग्रह] (पृष्ठ 7)
- रचनाकार : कलानन्द भट्ट
- प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
- संस्करण : 1983
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