खोलि हृदयक द्वार बैसल छी
kholi hridyak dvaar baisal chhi
सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
Sudhanshu 'Shekhar' Chaudhary
खोलि हृदयक द्वार बैसल छी
kholi hridyak dvaar baisal chhi
Sudhanshu 'Shekhar' Chaudhary
सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
और अधिकसुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
प्रतीक्षामे हुनक हम खोलि हृदयक द्वार बैसल छी,
शपथ खयलहुँ ने करबे आइ हम मनुहार बैसल छी
ओ आबथि आर घुरि नहि जाथि तत्पर सजग इन्द्रिय-मन
रचा स्वागतमे लाखो यत्नसँ शृंगार बैसल छी
हुनक सुधि-गन्धमे मातल, मिलनकेर आससँ जाँतल,
सिनेहक हाथमे लेने मधुर उपहार बैसल छी
उठय हल्लुक बसातो जँ हुनक पदचापकेर भ्रम हो,
गोटेको पात खसने तनक झनझन तार बैसल छी
उठैए अनेरे शंका किए मनमे न हम जानी,
असह सन भेल जाइत अछि विलम्बक भार बैसल छी
ने आबथि से असम्भव अछि, एहन नै निठुर निर्मोही,
ओ अपने हाथ पहिरौता मरणकेर हार बैसल छी
- पुस्तक : गजल ओ गीत
- रचनाकार : शेखर प्रकाशन, पटना
- प्रकाशन : सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
- संस्करण : 1991
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