धन्य अहाँ, धन्य अहाँ अपने ढ़कैत
dhanya ahan, dhanya ahan apne Dhakait
सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
Sudhanshu 'Shekhar' Chaudhary
धन्य अहाँ, धन्य अहाँ अपने ढ़कैत
dhanya ahan, dhanya ahan apne Dhakait
Sudhanshu 'Shekhar' Chaudhary
सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
और अधिकसुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
धन्य अहाँ, धन्य अहाँ अपने ढ़कैत छी,
जानी घोड़ी घास नहि गौरवे फटैत छी
अपन गोल, अपन ढोल अपन बोल मीठ महा,
आन यदि नीक कहय तकरो कटैत छी
अपने प्रशंसामे समय बरु बीति जाय,
आन यदि टोकि देलक तकरा हटैत छी
धयलक छपास रोग आर किछु करबे नहि,
अपन लेर चूअल जँ अपने चटैत छी
ई नहि देखब जे लोक की कहैत अछि,
की आर केहन अहाँ दुनिया जनैत अछि
लाज जे बिलायल अछि सभ ठाँ डटैत छी,
बेघर आ हेहर जकाँ अपने छँटैत छी
अपन तूर झाँपि भूर सभकेँ सप्त कहीं अहाँ,
अपनेकेँ उछालऽ ले सदिखन खटैत छी
- पुस्तक : गजल ओ गीत
- रचनाकार : शेखर प्रकाशन, पटना
- प्रकाशन : सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
- संस्करण : 1991
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