लफ़्ज़ से मानी यूँ अलगाया नहीं करते

लक्ष्मण गुप्त

लफ़्ज़ से मानी यूँ अलगाया नहीं करते

लक्ष्मण गुप्त

और अधिकलक्ष्मण गुप्त

    लफ़्ज़ से मानी यूँ अलगाया नहीं करते,

    हम दिखावे के लिए सजदा नहीं करते।

    हर किसी से माँगने जाया नहीं करते,

    पेड़ सब हैं सब मगर छाया नहीं करते।

    रोटियाँ करते जो हासिल बेचकर ख़ुद को,

    वो कभी ईमान का सौदा नहीं करते।

    गाँव में हम आज भी सुनते हैं इक क़िस्सा,

    जाने वाले लौटकर आया नहीं करते।

    ज़िंदगी को फिर नया माने नहीं मिलता,

    यूँ किसी को टूटकर चाहा नहीं करते।

    स्रोत :
    • रचनाकार : लक्ष्मण गुप्त
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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