कोना फहरैए आँचरक छोर सजनी
kona phaharaiye ancharak chhor sajni
कोना फहरैए आँचरक छोर सजनी
देखि मोनमे उठैछ हिलकोर सजनी
कियैक बनलहुँ-ए एहन कठोर सजनी
देखू टहकै-ए अंग पोर-पोर सजनी
राति पूनमकेर हो वा अमावसकेर
अहीँ आबी तँ होइछ इजोर सजनी
आब अपनहुँ तँ मोनकेर गप्प कहू
कियै लाजेँ कँपैत अछि ठोर सजनी
हम जे रहलहुँ एतेक दिन साधू बनल
आब बनबै अहाँ लए हम चोर सजनी
अहाँ महफिल जमाबऽमे जँ संग दी
फेर होमऽ ने देबैक भोर सजनी
- पुस्तक : पहरा इमानपर (मैथिली गजल-संग्रह) (पृष्ठ 25)
- रचनाकार : बाबा बैधनाथ
- प्रकाशन : गौरी प्रकाशन, कचहरी बलुआ, पूर्णिया
- संस्करण : 1989
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