Font by Mehr Nastaliq Web

कहबाक लूड़ि चाही, सुनबाक लूड़ि चाही

kahbak luDi chahi, sunbak luDi chahi

आनन्द मोहन झा

आनन्द मोहन झा

कहबाक लूड़ि चाही, सुनबाक लूड़ि चाही

आनन्द मोहन झा

और अधिकआनन्द मोहन झा

    कहबाक लूड़ि चाही, सुनबाक लूड़ि चाही

    सभ ऊँच-नीच देखैत बजबाक लूड़ि चाही।

    पूछब सवाल उनटा, उनटे जवाब भेटत

    समुचित जवाब खातिर पुछबाक लूड़ि चाही।

    आखर वैह रहै छै, मतलब हजार निकलै

    मनभाव की ककर से बुझबाक लूड़ि चाही।

    सभ भाव नीक-अधला अभरै सभक हियामे

    कविता कोनाक' हेतै, गढ़बाक लूड़ि चाही।

    तरुआरि-तीर बलेँ जिनगीक युद्ध बाबू

    जीतब कहाँ सहज छै, लड़बाक लूड़ि चाही।

    ईटक जवाब पाथर सभठाम नहि उचित छै

    सम्बन्ध-संग निमहै, सहबाक लूड़ि चाही।

    गेना गुलाब जूही फुलबारिमे जेना छै

    परिवारमे तेनाक' रहबाक लूड़ि चाही।

    स्रोत :
    • पुस्तक : तेँ ओ बजलैए (पृष्ठ 20)
    • रचनाकार : आनन्द मोहन झा
    • प्रकाशन : नवारम्भ, मधुबनी/पटना
    • संस्करण : 2023

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY