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जिनगी भरि हम कनैत रहलहुँ

jingi bhari hum kanait rahalahun

बाबा बैधनाथ

बाबा बैधनाथ

जिनगी भरि हम कनैत रहलहुँ

बाबा बैधनाथ

और अधिकबाबा बैधनाथ

    जिनगी भरि हम कनैत रहलहुँ

    जुल्म अहाँक सभ सहैत रहलहु

    नारीक रूपमे जनम लेल तेँ

    कठपुतरी बनि नचैत रहलहुँ

    देखि हमर हालतिकेँ अपने

    खुलि-खुलि खूब हँसैत रहलहुँ

    त्याग, दयाकेर मूर्ति बनल हम

    मोमबत्ती सन जरैत रहलहुँ

    तामस नहि भड़कय अपने केर

    एहि डरसँ हम डरैत रहलहुँ

    आश्वासनकेर बोल जहर सन

    अहाँ कहैत हम सुनैत रहलहुँ

    केहनो योग्य बनी तइयो हम

    तिलक वेदीपर चढ़ैत रहलहुँ

    ककरा लग दुःख प्रगट करू हम

    तिल-तिल कऽ तेँ गलैत रहलहुँ

    लऽ कोदारि अपनहि हाथेँ हम

    कब्र अपन कियै खुनैत रहलहु

    भऽ निराश हम एहि जिनगीसँ

    मौतक दिन नित गनैत रहलहुँ

    स्रोत :
    • पुस्तक : पहरा इमानपर (मैथिली गजल-संग्रह) (पृष्ठ 17)
    • रचनाकार : बाबा बैधनाथ
    • प्रकाशन : गौरी प्रकाशन, कचहरी बलुआ, पूर्णिया
    • संस्करण : 1989

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