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इंसान सुधरि जाय

insaan sudhari jaay

अशोक अज्ञानी

अशोक अज्ञानी

इंसान सुधरि जाय

अशोक अज्ञानी

और अधिकअशोक अज्ञानी

    इंसान सुधरि जाय तो समझौ कमाल है।

    माहौल सँवरि जाय तो समझौ कमाल है।

    कब ते फँसा है आदमी नफरत की बाढ़ मा

    जो पार उतरि जाय तो समझौ कमाल है।

    बस्ती हमारि झूठ के जंगल ते घिरी है

    सच राह निकरि जाय तो समझौ कमाल है।

    छपरा बड़े कमजोर गरीबन के हुवत हैं

    तूफान ठहरि जाय तो समझौ कमाल है।

    सदियन से झोपड़िन मा अँधियारु भरा है

    उजियार पसरि जाय तो समझौ कमाल है।

    भोरहे जो बिगरि जाय कामु अपने आप ते

    संझा का सँभरि जाय तो समझौ कमाल है।

    बिटिया बहू मा भेदु बहुत दिन ते चलि रहा

    यहु भेदु बिसरि जाय तो समझौ कमाल है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अशोक अज्ञानी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित।

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