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मोल राखय तखन जिनगी बनय

mol rakhay takhan jingi banay

बाबा बैधनाथ

बाबा बैधनाथ

मोल राखय तखन जिनगी बनय

बाबा बैधनाथ

और अधिकबाबा बैधनाथ

    मोल राखय तखन जिनगी बनय क्यो त्यागी जखन

    राति तखने सरस होयत रातिमे जागी जखन

    प्रेम निःस्वार्थे टिकै छै बात एकदम सत्य

    क्यो मित्रतासँ दूर तखने मित्रसँ मांगी जखन

    खाधिमे खसबय कुसंगति नित्य जँ सम्पर्क हो

    धर्म बाँचत मित्र तहिखन पापसँ भागी जखन

    छै विचारेकेर महत्ता पूज्य नहि कहियो धनिक

    बनब अह प्रियपात्र सभकेर सरलतम लागी जखन

    लाख भटकू एम्हर-ओम्हर स्वर्ग छै घरमे सदति

    अछि निरर्थक खुशी सभटा खुश ने वामांगी जखन

    कलपि रहलै मातृभाषा नोर नहि सूखय एकर

    जागृति तखने एतै, सभ बनब सहभागी जखन

    स्रोत :
    • पुस्तक : पहरा इमानपर (मैथिली गजल-संग्रह) (पृष्ठ 9)
    • रचनाकार : बाबा बैधनाथ
    • प्रकाशन : गौरी प्रकाशन, कचहरी बलुआ, पूर्णिया
    • संस्करण : 1989

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